भारतीय रुपया बुधवार को पहली बार डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर को पार कर गया, जिससे वित्तीय बाजारों में चिंता बढ़ गई है। अमेरिका–भारत ट्रेड डील पर अनिश्चितता, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और डॉलर की सीमित सप्लाई ने मुद्रा को रिकॉर्ड स्तर तक कमजोर किया। अब बाजार की नजर RBI की संभावित हस्तक्षेप और नीति घोषणा पर टिक गई है।
मुख्य तथ्य
- रुपया 16 तक गिरा—इतिहास का सबसे निचला स्तर।
- FPI ने 2025 में अब तक ₹1.48 लाख करोड़ की बिक्री की; दबाव लगातार बढ़ा।
- US–India ट्रेड डील अनिश्चितता और yen carry trade unwinding भी अहम कारण।
- RBI बाजार में सक्रिय, लेकिन किसी खास लेवल को डिफेंड नहीं कर रहा।
- हेजिंग कॉस्ट तेजी से बढ़ी; फॉरवर्ड प्रीमियम 7–12 bps तक उछला।
भारतीय रुपये में लगातार कमजोरी का दौर बुधवार को नए रिकॉर्ड पर पहुँच गया, जब मुद्रा पहली बार डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर से नीचे फिसल गई। शुरुआती कारोबार में 89.96 पर खुलने के बाद रुपया सीधे 90.16 तक गया और 10:46 बजे यह 90.12 पर ट्रेड कर रहा था।
साल 2025 में अभी तक रुपया 4.4% कमजोर हो चुका है।
ट्रेड डील की अनिश्चितता और FPI बिकवाली ने बढ़ाया दबाव
Kotak Securities के हेड ऑफ करंसी, अनिंद्य बनर्जी का कहना है कि Indo-US ट्रेड डील पर लगातार अनिश्चितता से बाजार में नाजुक भावना बनी हुई है।
उनके अनुसार:
- FPI आउटफ्लो,
- yen carry trade unwinding,
- और कम डॉलर सप्लाई
ने रुपये पर गहरा दबाव डाला है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक 2025 के अधिकांश महीनों में भारतीय इक्विटी बाजार में भारी बिकवाली कर रहे हैं। इस वर्ष अब तक FPIs ने ₹1.48 लाख करोड़ की बिक्री कर दी है।
सिर्फ दिसंबर के पहले दो दिनों में ही उन्होंने ₹4,335 करोड़ की इक्विटी offload की।
RBI की सीमित हस्तक्षेप—वोलैटिलिटी मैनेजमेंट पर फोकस
फॉरेक्स बाजार प्रतिभागियों का कहना है कि RBI बुधवार को बाजार में मौजूद था, लेकिन उसका हस्तक्षेप सीमित रहा।
एक विश्लेषक ने बताया:
“RBI का लक्ष्य केवल वोलैटिलिटी को नियंत्रित करना है, न कि किसी खास रेट को बचाना।”
इसका मतलब है कि 90 के नीचे गिरने देने का निर्णय संभवतः RBI की सोची-समझी रणनीति हो सकता है, खासकर जब वैश्विक बाजार भी अस्थिर हैं।
हेजिंग कॉस्ट में उछाल—फॉरवर्ड प्रीमियम तेज
रुपये के 90 के पार जाते ही कंपनियाँ और ट्रेडर्स हेजिंग की ओर भागे, जिससे फॉरवर्ड प्रीमियम बढ़ गया।
- 1-year USD/INR प्रीमियम मंगलवार को 7 bps और चढ़ा
- कुल वृद्धि 3 दिनों में 12 bps से अधिक
- 1-month टेनर 7 महीने के हाई 19.5 पैसे पर पहुँचा।
Mecklai Financial Services की CEO दीप्ति चितले के अनुसार:
“बाजार का अनुमान है कि RBI रुपये को और समायोजित (adjust) होने दे सकता है, खासकर जब 88.80 का पुराना डिफेंस लेवल टूट चुका है।”
इनफ्लेशन और इंपोर्ट पर दबाव
Bank of Baroda के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है:
- कमज़ोर रुपया एक्सपोर्टर्स को थोड़ा लाभ देगा
- लेकिन यह इंपोर्ट महंगे करेगा
- और महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ाएगा
इसके साथ ही India–US 10-year yield स्प्रेड लगभग 250 bps तक पहुँच गया है—यह पिछले एक साल का सबसे बड़ा अंतर है, जो विदेशी निवेशकों के करंसी-रिस्क को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।
क्या आगे भी कमजोर रहेगा रुपया?
विश्लेषकों के अनुसार घरेलू मुद्रा पर दबाव निकट भविष्य में जारी रहने की संभावना है।
हालांकि, US–India ट्रेड डील पर कोई सकारात्मक संकेत आते ही बाजार में तेज़ सुधार देखने को मिल सकता है।
LKP Securities के जतीन त्रिवेदी ने कहा:
“अभी बाजार में 91 तक जाने की भी चर्चा है, लेकिन RBI पॉलिसी के बाद रुपया 88–89 की ओर भी लौट सकता है।”
सबनवीस ने भी कहा कि 88 के स्तर को पार करने के बाद से बाजार केवल “अनुमानों पर चल रहा है”—और मौजूदा ट्रेंड पूरी तरह अनुमान-आधारित है।


