Ikkis Movie Review: जंग की कहानी, लेकिन जश्न नहीं—एक गहरी और संवेदनशील एंटी-वॉर फिल्म

अगस्त्य नंदा और धर्मेंद्र की ‘इक्कीस’ शौर्य के साथ-साथ युद्ध की कीमत भी याद दिलाती है

manshi
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Ikkis movie

‘Ikkis’ उस तरह की वॉर फिल्म नहीं है, जो शोर, नारेबाज़ी और बेवजह की हिंसा के सहारे दर्शकों को बांधने की कोशिश करे। यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी कहती है, लेकिन सिर्फ बहादुरी का बखान नहीं करती। यह युद्ध के बाद बच जाने वालों पर पड़ने वाले गहरे असर को भी सामने रखती है।

फिल्म की शुरुआत एक छोटे से, लेकिन असरदार पल से होती है। एक सीनियर अफसर पूछता है—उम्र कितनी है? जवाब आता है—“Ikkis।” अरुण खेत्रपाल 22 के भी नहीं हो पाए, लेकिन उसी उम्र में उन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी और परमवीर चक्र पाने वाले सबसे कम उम्र के अधिकारी बने।

युद्ध से आगे की कहानी

निर्देशक श्रीराम राघवन की यह फिल्म सिर्फ रणभूमि तक सीमित नहीं रहती। वह यह दिखाने की कोशिश करती है कि युद्ध के बाद क्या बचता है—यादें, पछतावा, और ऐसी दरारें जो कभी पूरी तरह भरती नहीं। हाल के वर्षों में आई कई युद्ध फिल्मों की तुलना में ‘Ikkis’ का यह रुख इसे अलग बनाता है।

फिल्म में खून है, मौत है, लेकिन वह दिखावे के लिए नहीं। हिंसा को ग्लोरिफाई करने से यह साफ तौर पर बचती है। सैनिकों की गरिमा, उनका अनुशासन और आपसी भाईचारा यहां अहम है। एक तरफ सीमा पर टैंकों की लड़ाई है, तो दूसरी तरफ इंसानियत की छोटी-छोटी झलकें भी हैं।

अभिनय और किरदार

अरुण खेत्रपाल के रोल में अगस्त्य नंदा का चेहरा और उनकी मासूमियत नए अफसर की भूमिका के साथ जंचती है। अनुभवहीनता उनके अभिनय में कमजोरी नहीं, बल्कि किरदार की सच्चाई बनकर आती है।

धर्मेंद्र रिटायर्ड ब्रिगेडियर मदन खेत्रपाल के रोल में भावनात्मक गहराई लाते हैं। यह उनका आखिरी फिल्मी प्रदर्शन है और कुछ दृश्यों में उनका दर्द साफ महसूस होता है, खासकर जब वे ‘वतन’ और ‘मिट्टी’ की बात करते हैं। हालांकि, संवाद अदायगी की धीमी गति कई जगह फिल्म की रफ्तार को थाम लेती है।

जयदीप अहलावत पाकिस्तानी ब्रिगेडियर के किरदार में हमेशा की तरह असर छोड़ते हैं। उनके चेहरे पर सालों से दबा अफसोस और मजबूरी बिना ज्यादा संवाद के भी समझ में आती है। सिकंदर खेर, विवान शाह और राहुल देव अपनी भूमिकाओं में संतुलित रहते हैं। सिमर भाटिया की मौजूदगी फिल्म में एक हल्का, मानवीय स्पर्श जोड़ती है।

क्या खटकता है

फिल्म में दो टाइमलाइन के बीच लगातार आना-जाना कई बार ध्यान भटकाता है। कुछ कट्स जरूरत से ज्यादा उभरकर सामने आते हैं। 142 मिनट की अवधि में थोड़ा कसाव होता, तो असर और गहरा हो सकता था।

सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया

फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर राय बंटी हुई है।
कुछ दर्शकों ने इक्कीस को “एंटी-वॉर” और “अमन की आशा” वाली फिल्म बताते हुए आरोप लगाया कि यह अरुण खेतरपाल की शहादत को कमजोर करती है। कुछ यूजर्स ने इसे “प्रोपेगेंडा” तक कहा और भारतीय सेना की छवि को लेकर नाराजगी जताई।

अंतिम बात

‘Ikkis’ यह साफ कहती है कि युद्ध में जीत-हार से ज्यादा अहम होती है इंसानी कीमत। दोनों तरफ नुकसान होता है और कोई भी पूरी तरह विजेता नहीं होता। यह फिल्म दर्शक को भावनात्मक रूप से झकझोरती है, बिना चीखने-चिल्लाने के।

2026 की यह एक सधी हुई शुरुआत है। ‘Ikkis’ उन फिल्मों में है, जो देखने के बाद कुछ देर तक आपके साथ रहती है—और आज के दौर में यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

रेटिंग: (1/5)

 

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