‘द राजा साब’ रिव्यू: प्रबास का अपनापन, लेकिन कहानी खुद के जाल में उलझी

मजबूत आइडिया, बड़े स्टार और भारी स्केल के बावजूद फिल्म बिखरी हुई और थकी हुई लगती है

Virat
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The Raja Saab

मारुति के निर्देशन में बनी द राजा साब को देखते हुए एक अजीब एहसास होता है। फिल्म के लगभग दो-तिहाई हिस्से तक पहुंचते-पहुंचते लगता है कि निर्देशक किसी दिलचस्प और थोड़े परिपक्व मोड़ की तरफ बढ़ रहे हैं। नायक राजू (प्रबास) और खलनायक कनकराजू (संजय दत्त) के बीच टकराव है, लेकिन बिना आमने-सामने आए। दोनों दिमागी खेल खेलते हैं, एक-दूसरे को चुनौती देते हैं और यह लड़ाई मगरमच्छों, खतरनाक जालों और मानसिक युद्ध के जरिए आगे बढ़ती है। कागज पर यह आइडिया रोमांचक है— एक दादा और पोते के बीच चल रही माइंड गेम।

समस्या यह है कि फिल्म इस संभावनाशील आइडिया को बहुत देर से पहचानती है।

आइडिया बहुत, दिशा नहीं
शुरुआत में द राजा साब एक आकर्षक पैकेज की तरह लगती है। यह एक युवा लड़के की कहानी है, जो अपनी दादी की खोई हुई इज्जत वापस पाना चाहता है। इसमें भूतिया महल है, हल्की-फुल्की कॉमेडी है, कभी यह रोमांटिक कॉमेडी बनती है, तो कभी हैरी पॉटर या नार्निया जैसी ‘मैजिकल’ दुनिया का आभास देती है। कहीं-कहीं यह साइंस-फिक्शन और रहस्य की तरफ भी जाती है।

लेकिन धीरे-धीरे यही विविधता फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। इतने सारे आइडियाज एक-दूसरे पर ऐसे चढ़ते हैं कि कहानी न तो साफ रहती है और न ही भावनात्मक रूप से जुड़ पाती है। फिल्म की ऊर्जा बिखर जाती है और दर्शक यह समझने में उलझा रहता है कि असल कहानी किस दिशा में जा रही है।

कहानी का बोझ और कमजोर लेखन
फिल्म एक जटिल विषय को छूती है, लेकिन उसे स्पष्ट और सुलझे हुए तरीके से पेश नहीं कर पाती। पहले हाफ का बड़ा हिस्सा बिना किसी ठोस मकसद के निकल जाता है। राजू और उसकी दादी गंगम्मा (ज़रीना वहाब) का रिश्ता भावनात्मक है, लेकिन दादी के अतीत और उसकी पीड़ा की गहराई पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।

निधि अग्रवाल का किरदार, जो नन बनने की कगार पर है, मनोरंजक तो है, लेकिन कहानी में उसकी मौजूदगी का कोई खास असर नहीं पड़ता। संजय दत्त का कनकराजू प्री-इंटरवल में प्रभावशाली एंट्री करता है, लेकिन उसके मकसद और पहचान को लेखन मजबूत नहीं कर पाता। जब तक असली टकराव शुरू होता है, तब तक काफी वक्त बेकार की चीजों में खर्च हो चुका होता है।

किरदारों के साथ अन्याय
फिल्म की एक बड़ी समस्या यह भी है कि कई किरदार बिना ठोस वजह के आते-जाते रहते हैं। मालविका मोहनन का किरदार कहानी में अहम हो सकता था, लेकिन उसे सिर्फ सजावटी भूमिका तक सीमित कर दिया गया है। समुथिरकानी जैसे अभिनेता का किरदार भी असर छोड़ने में नाकाम रहता है। रिद्धि कुमार के साथ रोमांटिक ट्रैक पुराने और थके हुए नजर आते हैं, जो आज के समय में खटकते हैं।

जहां फिल्म थोड़ी संभलती है
यह सब होते हुए भी फिल्म को पूरी तरह खारिज करना आसान नहीं है। मारुति की कॉमिक टाइमिंग कुछ जगह काम करती है। प्रबास राजू के किरदार में सहज, जमीन से जुड़े और पसंद करने लायक लगते हैं। हाल के वर्षों में यह उनका ज्यादा रिलेटेबल परफॉर्मेंस कहा जा सकता है। सपोर्टिंग कलाकारों के साथ उनके कुछ दृश्य मजेदार हैं और एक बेहतर फिल्म की झलक देते हैं।

ज़रीना वहाब के साथ भावनात्मक सीन असर छोड़ते हैं। क्लाइमेक्स के आसपास निर्देशन थोड़ी पकड़ बनाता है। वीएफएक्स तकनीकी रूप से अच्छे हैं, हालांकि वे भी कहानी को बचा नहीं पाते। थमन का बैकग्राउंड स्कोर कुछ पलों को ऊंचा जरूर करता है, लेकिन वह भी फिल्म का सहारा नहीं बन पाता।

अंतिम बात
द राजा साब एक ऐसी फिल्म है, जिसमें संभावनाएं बहुत थीं। अगर यह अपनी मजबूत मूल अवधारणा पर टिके रहती और उसे सरलता से आगे बढ़ाती, तो कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता था। इसके उलट फिल्म बार-बार भटकती है और दर्शक की सहनशक्ति की परीक्षा लेती है।

प्रबास का अपनापन और कुछ अच्छे सीन ही इसकी सबसे बड़ी याद रह जाते हैं। बाकी, यह फिल्म खुद की बनाई भूलभुलैया में रास्ता ढूंढती हुई नजर आती है।

रेटिंग: ⭐⭐ (2/5)

 

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