यादें

सर्दी की ठंडी सुबह जब,
धुंध सब कुछ ढक लेती है।
सड़क, पेड़, दिशा—
कुछ साफ़ नहीं दिखता।
पर उसी धुंध में
तुम्हारी यादें
बेआवाज़ चली आती हैं।
वे यादें
जो शोर नहीं करतीं,
बस भीतर
धीमी आग की तरह
लगातार जलती रहती हैं—
ना बुझने की ज़िद में,
ना भड़कने की।
– Vivek Balodi
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