बीच में जगह

Beech mai jagah
✍️ Vivek Balodi

इन दिनों
खुद को सम्हालने की आदत
कोई शौक़ नहीं,
ज़रूरत बन गई है।
जैसे जेब में रखा सिक्का
हर कदम पर उँगलियों से
टटोल लिया जाता है।

दिन की थकान
रात तक खींच लाता हूँ,
शाम की चुप्पी
बिना बाँटे ही पी जाता हूँ।

मन में एक उम्मीद
हल्की-सी आवाज़ करती है—
तुम सामने होगी
और बोझ
बिना उतारे ही
कम लगने लगेगा।

कुछ चीज़ें
कहने से पहले ही
साझा होने लगती हैं—
चाय की भाप,
काम के बाद की थकी साँस,
और वो छोटी खुशी
जिसे जानबूझकर
अंत तक बचा कर रखा जाता है।

मुझे पता है,
ये चाहना थोड़ा अपना-सा है—
अपने सुख-दुख को
आधे में रख देना।

पर रिश्ते
पूरा ले जाने की माँग नहीं करते,
बस इतना चाहते हैं
कि बीच में
एक-दूसरे के लिए जगह हो।

तुम बोलो तो
मैं हर बात समझने की
कोशिश नहीं करूँगा,
कुछ शब्दों को
जैसे हैं
वैसे ही सुन लूँगा।

बाक़ी सब
बाद में देखेंगे।

अभी तो इतना काफ़ी है
कि हम एक ही जगह
बिना जल्दबाज़ी के बैठ सकें,
और जो जैसा है
उसे वैसा ही
थोड़ी देर रहने दें।

–  Vivek Balodi

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