अधूरा घर

ghar
✍️ Vivek Balodi

कभी सोचता हूँ
जहाँ सुबह
घड़ी देखकर नहीं उठती होंगी,
खिड़की से आती रोशनी
बताती होगी
कि अब चल पड़ो।

बातें ऊँची आवाज़ में नहीं,
पास बैठकर होती होंगी,
और चुप्पी
किसी कमी की तरह नहीं
आराम की तरह रहती होगी।

लोग नाम से पहले
थोड़ा-सा मन पहचानते होंगे,
इसलिए मिलने पर
हाथ नहीं,
आँखें आगे बढ़ती होंगी।

शामें लौटते वक्त
कुछ बोझ उतार लेती होंगी,
दरवाज़ा खुलते ही
थकान
अंदर आने से पहले ही
रुक जाती होगी।

मकान वहाँ
मज़बूत दिखने के लिए नहीं,
टिके रहने के लिए बने होंगे,
छतें ऊँची नहीं
पर भरोसे जितनी होंगी।

और अगर कोई कह दे
यह जगह कुछ ज़्यादा ही शांत है,
तो मैं बस
हल्की-सी साँस लूँगा।

और कहूँगा—
यह ख़्वाबों की दुनिया है,
यहाँ मेरा भी
एक  घर है।

–  Vivek Balodi

Leave a Comment