यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने इस महीने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को अधिसूचित करते हुए दावा किया कि इसका मकसद विश्वविद्यालयों में भेदभाव को खत्म करना और समावेशन को संस्थागत रूप देना है। इन नियमों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कमेटी और औपचारिक शिकायत व्यवस्था अनिवार्य की गई है।
लेकिन नियमों के आते ही विवाद भी तेज़ हो गया। छात्र संगठनों में मतभेद उभरे, उत्तर प्रदेश में भाजपा के कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफ़े दिए और सार्वजनिक बहस का केंद्र “दुरुपयोग की आशंका” बन गई। इस शोर के बीच असली सवाल कहीं दबता दिखा—क्या ये नियम वाकई कैंपस में मौजूद जातिगत भेदभाव को समझने और उससे निपटने में मदद करेंगे?
कैंपस में भेदभाव दिखता कैसे है?
अब तक विश्वविद्यालयों में भेदभाव को अक्सर खुली घटनाओं तक सीमित करके देखा गया है—जैसे रैगिंग, गाली-गलौज, अपमानजनक व्यवहार या शिक्षक-छात्र के बीच टकराव। लेकिन शिक्षाविदों का कहना है कि जाति का असर इससे कहीं ज़्यादा सूक्ष्म और गहरा होता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर लतिका गुप्ता के मुताबिक, समस्या की जड़ उस शैक्षणिक असमानता में है, जो छात्र स्कूल से ही अपने साथ लेकर आते हैं। उनके अनुसार, निजी स्कूलों से आए छात्रों की अंग्रेज़ी और अभिव्यक्ति पर पकड़ ज़्यादा मज़बूत होती है, जबकि आरक्षित वर्गों के कई छात्र सरकारी या राज्य बोर्ड स्कूलों से आते हैं। समय के साथ यह अंतर “योग्यता” के नाम पर पढ़ा जाता है और उसे जाति से जोड़ दिया जाता है।
उनका कहना है कि भेदभाव सिर्फ गाली या उत्पीड़न तक सीमित नहीं है। असल में व्यवस्था ही असमानताओं को दोहराती रहती है—पाठ्यक्रम, मूल्यांकन और अकादमिक अपेक्षाओं के स्तर पर।
व्यवहार की समस्या या सिस्टम की?
नए UGC नियम मुख्य रूप से शिकायत निवारण पर केंद्रित हैं—किसी व्यक्ति के भेदभावपूर्ण व्यवहार की पहचान और उस पर कार्रवाई। आलोचकों का कहना है कि इससे जाति को सिर्फ एक व्यवहारिक समस्या मान लिया गया है, जबकि वह संस्थागत ढांचे में गहराई से मौजूद है।
लतिका गुप्ता इसे नियमों की सबसे बड़ी कमी मानती हैं। उनके अनुसार, समानता सामान्य दिशानिर्देशों से हासिल नहीं की जा सकती। जब सिस्टम ही वंचित पृष्ठभूमि से आए छात्रों को उन्नत ज्ञान सिखाने के लिए तैयार नहीं है, तब सिर्फ व्यवहार सुधारने से बराबरी नहीं आएगी।
वहीं समाजशास्त्री सतीश देशपांडे का मानना है कि नियमों का महत्व इस बात में है कि वे भेदभाव को नाम देते हैं। उनके अनुसार, सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब उत्पीड़न को स्वीकार करने तक की अनुमति न हो। यह कानून कम से कम यह दिखावा मुश्किल बना देता है कि समस्या मौजूद ही नहीं है।
क्या नई समितियां कुछ बदल पाएंगी?
विश्वविद्यालयों में पहले से ही कई समितियां मौजूद हैं—एंटी-रैगिंग, शिकायत निवारण, यौन उत्पीड़न रोकथाम से जुड़ी। लेकिन इन पर अक्सर निष्क्रिय या औपचारिक होने के आरोप लगते रहे हैं।
पूर्व कुलपति फ़ुरक़ान क़मर को चिंता है कि नई इक्विटी कमेटियां भी इसी राह पर न चल पड़ें। उनके अनुसार, सवाल नियमों से ज़्यादा उनके अमल का है। अगर संस्थान संवेदनशील नहीं हैं, तो नई संरचनाएं भी असरहीन हो सकती हैं।
गुप्ता इसी संदर्भ में छात्रवृत्तियों का उदाहरण देती हैं—जब यह सबको पता है कि कई एसटी छात्र आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर पृष्ठभूमि से आते हैं, तो उनकी स्कॉलरशिप समय पर क्यों नहीं मिलती? यह असंवेदनशीलता सिस्टम के स्तर पर मौजूद है।
एक ही फ्रेम में जाति, EWS और दिव्यांगता
नियमों का सबसे विवादित पहलू यह है कि इनमें SC, ST, OBC, EWS और दिव्यांग व्यक्तियों को एक ही “इक्विटी फ्रेमवर्क” में रखा गया है। लतिका गुप्ता इसे गंभीर वैचारिक गलती मानती हैं। उनके अनुसार, गरीबी या शारीरिक अक्षमता की चुनौतियां जाति से अलग हैं। जाति व्यक्ति की सामाजिक क्षमता को स्थायी रूप से तय कर देती है, और इसे अन्य श्रेणियों के साथ बराबर रख देना समस्या को हल्का कर देता है।
हालांकि सतीश देशपांडे इसे कानूनी दृष्टि से व्यावहारिक मानते हैं। उनके लिए असली सवाल यह है कि ज़मीन पर इसका इस्तेमाल कैसे होगा।
दुरुपयोग की आशंका और असुरक्षा
नियमों के विरोध में सबसे ज़्यादा जिस बात को उछाला गया, वह है दुरुपयोग का डर। फ़ुरक़ान क़मर मानते हैं कि मौजूदा समय में कई विश्वविद्यालय प्रशासन पहले से ही छात्रों और शिक्षकों के प्रति सख़्त रुख अपनाए हुए हैं। ऐसे में चयनात्मक इस्तेमाल की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन देशपांडे इसे हर सशक्तिकरण कानून के साथ उठने वाली परिचित प्रतिक्रिया बताते हैं। उनके अनुसार, जब भी कमज़ोर वर्गों के लिए कोई कानून आता है, सबसे पहले “मिसयूज़” की बात होती है। असल में यह उस विशेषाधिकार की प्रतिक्रिया होती है, जिसे अब चुनौती दी जा रही है।
तो क्या ये नियम फर्क डाल पाएंगे?
लतिका गुप्ता को इसमें खास उम्मीद नहीं दिखती। उनके मुताबिक, जाति कोई इंजेक्शन से ठीक होने वाली समस्या नहीं है। यह पहचान बचपन से बनती है और विश्वविद्यालय स्तर पर पहुंचते-पहुंचते गहराई से जड़ जमा चुकी होती है। उनके अनुसार, असली ज़रूरत पाठ्यक्रम सुधार, अकादमिक सहयोग और संस्थागत संवेदनशीलता की है।
फ़ुरक़ान क़मर भी सावधान नज़र आते हैं। उनके लिए नियम अच्छे हैं, लेकिन खतरा यही है कि वे काग़ज़ों तक सीमित न रह जाएं।
सतीश देशपांडे इसे एक शुरुआती कदम मानते हैं। उनके शब्दों में, भेदभाव कानून से नहीं, प्रतिरोध से खत्म होता है। लेकिन कानून उस प्रतिरोध के लिए एक प्रतीकात्मक ज़मीन ज़रूर तैयार करता है।



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