जाति आधारित भेदभाव पर नई UGC नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, ‘समाज को बांटने वाले गंभीर असर’ की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 की UGC Regulations को फिलहाल लागू न करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि नियमों में कई बुनियादी सवाल हैं, जिनका समाधान हुए बिना इन्हें लागू करना खतरनाक हो सकता है।

Virat
Virat
By
5 Min Read
UGC जाति भेदभाव नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

जाति आधारित भेदभाव से जुड़े नए UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। गुरुवार को अदालत ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को स्थगित कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि इन नियमों से जुड़े कई अहम सवाल हैं, जिन पर विचार किए बिना इन्हें लागू किया गया तो इसके “बहुत व्यापक और खतरनाक असर” हो सकते हैं और यह समाज को बांट सकते हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी करते हुए कहा कि फिलहाल 2026 की नियमावली लागू नहीं होगी। अदालत ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह भी निर्देश दिया कि 2012 की UGC Regulations आगे के आदेश तक लागू रहेंगी।

यह समाज को बांट देगा”

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले में चार-पांच ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब जरूरी है। अगर इन्हें नजरअंदाज किया गया, तो इसका असर सिर्फ शिक्षा संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा।
उनका कहना था कि इससे समाज में विभाजन पैदा हो सकता है और इसके नतीजे बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

जस्टिस बागची ने भी चिंता जताते हुए कहा कि भारत को ऐसी स्थिति में नहीं जाना चाहिए, जहां शिक्षा संस्थान भी अलगाव का प्रतीक बन जाएं। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कभी स्कूलों में नस्ल के आधार पर अलगाव देखने को मिला, और भारत को उस रास्ते पर नहीं जाना चाहिए। उनके मुताबिक, देश की एकता शिक्षा संस्थानों में भी झलकनी चाहिए।

नियमों की भाषा पर सवाल

याचिकाकर्ताओं ने खास तौर पर नियमों की धारा 3(c) को चुनौती दी है। कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि अगर किसी छात्र के साथ क्षेत्रीय या अन्य आधार पर उत्पीड़न होता है, तो क्या मौजूदा नियम उसे ठीक से संबोधित करते हैं।

इस पर बहस के दौरान अदालत ने पाया कि भेदभाव की परिभाषा से जुड़ी कुछ धाराएं आपस में टकराती या दोहराव वाली लगती हैं। जस्टिस बागची ने कहा कि अगर 2012 के नियम पहले से ही व्यापक भेदभाव को कवर करते थे, तो नए नियमों में कुछ प्रावधानों को अलग से जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी पूछा कि अगर एक ही जाति के भीतर प्रभावशाली छात्र, उसी जाति के अन्य छात्रों को परेशान करें, तो क्या नए नियम उस स्थिति को कवर करते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ऐसी स्थिति के लिए नियमों में स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
कोर्ट की टिप्पणी थी कि नियमों की भाषा पहली नजर में अस्पष्ट है और इसके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या हम पीछे की ओर जा रहे हैं?’

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि इस पूरे मुद्दे पर प्रख्यात विधिवेत्ताओं की एक समिति बनाई जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि समिति के गठन में अदालत को भरोसे में लिया जाए।

मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि आजादी के 75 साल बाद, जब देश जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ा है, तो क्या इस तरह की नीतियां हमें पीछे ले जाएंगी। उन्होंने नियमों में अलग-अलग हॉस्टल की बात पर भी नाराजगी जताई और कहा कि ऐसे कदम समाज को जोड़ने के बजाय और तोड़ सकते हैं।

सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि इस दिशा में जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2026 की UGC Regulations पर रोक लगी रहेगी और 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। इस मामले में अगली सुनवाई के दौरान केंद्र और UGC की प्रतिक्रिया अहम मानी जाएगी।

Share This Article
Leave a Comment