केंद्र सरकार की ओर से पुराने टैक्स सिस्टम को लेकर कोई “सनसेट डेट” तय नहीं की गई है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) के चेयरमैन रवि अग्रवाल ने कहा है कि टैक्सपेयर्स के पास आज भी विकल्प मौजूद है और विभाग किसी पर नई टैक्स व्यवस्था थोप नहीं रहा।
द इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि आकलन वर्ष 2025-26 में करीब 88% व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स नई टैक्स रिजीम में आ चुके हैं, इसके बावजूद पुराने सिस्टम को खत्म करने का फिलहाल कोई फैसला नहीं है।
नई टैक्स व्यवस्था की ओर बढ़ता रुझान
CBDT चेयरमैन के मुताबिक कुल मिलाकर करीब 86% टैक्सपेयर्स अब नई टैक्स व्यवस्था में हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 11% ज्यादा है। खासतौर पर छोटे कारोबारियों और प्रोफेशनल्स से जुड़े ITR-4 में यह आंकड़ा 97% तक पहुंच गया है।
उन्होंने कहा कि लोग अपने फायदे को देखकर खुद नई व्यवस्था चुन रहे हैं, खासकर बदले हुए स्लैब और कम टैक्स दरों के कारण।
पुराने सिस्टम की अब भी भूमिका
पुराने टैक्स सिस्टम को लेकर पूछे गए सवाल पर रवि अग्रवाल ने साफ कहा कि कुछ टैक्सपेयर्स को अभी भी इसमें फायदा दिखता है, खासकर वे लोग जो छूट और कटौतियों का बेहतर उपयोग कर पाते हैं।
इसी वजह से सरकार ने इसे खत्म करने की कोई समयसीमा तय नहीं की है और विकल्प टैक्सपेयर्स के पास ही रहेगा।
रिफंड में देरी का आरोप खारिज
रिफंड में देरी को लेकर उठ रहे सवालों पर CBDT चेयरमैन ने स्पष्ट किया कि इसका मकसद लोगों को नई टैक्स व्यवस्था की ओर धकेलना नहीं है।
उन्होंने बताया कि अब तक 95% रिफंड जारी किए जा चुके हैं और फरवरी महीने में बाकी अधिकतर मामलों को भी निपटा दिया जाएगा।
उनका कहना था कि इस बार रिफंड की कुल रकम कम दिख रही है, क्योंकि टैक्स दरों और TDS को तर्कसंगत बनाया गया है और ज्यादा लोग नई टैक्स व्यवस्था में आ चुके हैं। इसका मतलब यह नहीं कि रिफंड रोके गए हैं।
‘नज’ अभियान से गलत दावों पर लगाम
रवि अग्रवाल ने बताया कि डेटा एनालिटिक्स के जरिए ऐसे मामलों की पहचान हुई, जहां रिफंड या कटौती के दावे गलत थे। इसके बाद ‘NUDGE’ अभियान चलाया गया, जिससे बड़ी संख्या में लोगों ने अपने रिटर्न संशोधित किए।
इस प्रक्रिया से पिछले दो साल में हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त टैक्स सामने आया और बड़ी संख्या में नॉन-फाइलर्स भी सिस्टम में आए।
F&O और STT पर भी रखी बात
फ्यूचर्स और ऑप्शंस पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाने को लेकर उन्होंने कहा कि इसका मकसद सिर्फ राजस्व बढ़ाना नहीं है। अगर ट्रेडिंग वॉल्यूम घटता है तो टैक्स कलेक्शन भी घटेगा, और अगर असर नहीं पड़ता तो बढ़ेगा।
उन्होंने साफ किया कि आगे क्या कदम उठाने हैं, यह सेबी का विषय है और इस पर उनके पास कोई सलाह नहीं है।


