भारत को AI में क्या बनाना चाहिए? ‘BharatGPT’ के निर्माता अंकुश सभरवाल ने रखी साफ राय

“सिर्फ बड़े मॉडल बनाने की दौड़ नहीं, काम की AI सॉल्यूशंस बनाना ज्यादा जरूरी”

Virat
Virat
By
5 Min Read
नई दिल्ली AI समिट

नई दिल्ली में चल रहे इंडिया AI समिट के बीच भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रणनीति को लेकर एक अहम बहस सामने आई है। क्या भारत को दुनिया की तरह बेहद बड़े और महंगे AI मॉडल बनाने चाहिए, या फिर ऐसे समाधान तैयार करने चाहिए जो सीधे देश की जरूरतों को पूरा करें?

BharatGPT के निर्माता और CoRover के सीईओ अंकुश सभरवाल का मानना है कि भारत को अपनी प्राथमिकताएं साफ रखनी चाहिए। उनका कहना है कि AI के क्षेत्र में असली ताकत सिर्फ “मेगा मॉडल” बनाने में नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान देने में है।

कंप्यूट की चुनौती, लेकिन रास्ता भी मौजूद

छोटी भारतीय कंपनियों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत AI सिस्टम चलाने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर—जैसे GPU और सेमीकंडक्टर—तक पहुंच की होती है। इस पर सभरवाल कहते हैं कि आज तकनीकी तौर पर मॉडल बनाना मुश्किल नहीं है। ओपन सोर्स डेटा और एल्गोरिद्म की मदद से कोई भी मॉडल तैयार किया जा सकता है।

लेकिन असली सवाल यह है कि वह मॉडल किस समस्या को हल कर रहा है?

उनका कहना है कि हर किसी को ट्रिलियन-पैरामीटर वाला विशाल मॉडल बनाने की जरूरत नहीं है। ऐसे मॉडल बनाने के लिए लंबे समय की दृष्टि और भारी संसाधनों की जरूरत होती है—और शुरुआत में उससे आमदनी भी नहीं होती।

IndiaAI मिशन के तहत GPU सस्ती दरों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। बाजार में जहां एक GPU की कीमत लगभग 400 रुपये प्रति घंटा है, वहीं इस मिशन के तहत करीब 67 रुपये प्रति घंटा में मिल रहा है। हालांकि, सभरवाल साफ करते हैं कि उनका लक्ष्य “GPU जलाना” नहीं, बल्कि ऐसी AI बनाना है जो edge devices पर भी काम करे और ज्यादा लोगों तक पहुंचे।

क्या भारत में डेटा की कमी है?

AI मॉडल के लिए उच्च गुणवत्ता वाले भारतीय डेटा की कमी की बात अक्सर उठती है। इस पर सभरवाल का नजरिया अलग है। उनका कहना है कि डेटा की उपलब्धता इस बात पर निर्भर करती है कि आप क्या बनाना चाहते हैं।

अगर किसी खास सेक्टर—जैसे ट्रैवल या डिफेंस—के लिए समाधान बनाना है, तो संबंधित संस्थाओं के साथ साझेदारी की जा सकती है। इसके अलावा Common Crawl, AI4Bharat, Bhashini और AI Kosh जैसे ओपन सोर्स प्लेटफॉर्म भी उपलब्ध हैं।

उनके मुताबिक, सही डेटा ही असली फर्क पैदा करता है। अगर डेटा सटीक है, तो समाधान भी मजबूत बनेगा।

गणित के शोधकर्ताओं की कमी: चुनौती, लेकिन निर्णायक नहीं

एक अहम सवाल यह भी है कि चीन जैसे देशों की तुलना में भारत में गणित और गहरे शोध वाले विशेषज्ञों की संख्या कम है। क्या यह AI विकास के लिए लंबी अवधि की बाधा है?

सभरवाल मानते हैं कि यह समस्या वास्तविक है। गहरे शोध और डीप टेक प्लेटफॉर्म बनाने के लिए मजबूत गणितीय और विश्लेषणात्मक क्षमता की जरूरत होती है। इसी वजह से भारत से कम रिसर्च पेपर और कम डीप टेक कंपनियां निकलती हैं।

लेकिन वह यह भी जोड़ते हैं कि हर AI समाधान के लिए अत्यधिक गणितीय शोध जरूरी नहीं है। बड़े और मूलभूत AI प्लेटफॉर्म बनाने के लिए डीप टेक विशेषज्ञ चाहिए, लेकिन व्यावहारिक AI सॉल्यूशंस तैयार करने का दायरा कहीं बड़ा है।

भारत के लिए रास्ता क्या?

सभरवाल की बातों से एक स्पष्ट संकेत मिलता है—भारत को AI की वैश्विक दौड़ में शामिल जरूर होना है, लेकिन अपनी ताकत के साथ।

  • जहां जरूरी हो, वहां बड़े मॉडल बनाए जाएं
  • लेकिन प्राथमिकता ऐसे AI समाधानों को दी जाए जो शासन, रक्षा, बैंकिंग और सार्वजनिक सेवाओं में काम आएं
  • और तकनीक को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाए

AI की बहस सिर्फ तकनीकी नहीं है। यह संसाधन, रणनीति और प्राथमिकताओं का सवाल भी है। भारत के सामने चुनौती यह नहीं कि क्या वह मॉडल बना सकता है, बल्कि यह है कि वह किस तरह की AI बनाना चाहता है।

Share This Article
Leave a Comment