नाबालिग ड्राइविंग पर फिर सवाल: दो हादसे, एक जैसी लापरवाही

दिल्ली में 23 वर्षीय बाइक सवार की मौत के बाद 2016 के सिधार्थ शर्मा केस की याद ताज़ा, पुलिस और विशेषज्ञों ने अभिभावकों की जिम्मेदारी पर जोर दिया

Virat
Virat
By
5 Min Read
23 वर्षीय युवक की मौत के बाद दिल्ली में नाबालिग ड्राइविंग पर बहस तेज। 2016 केस की याद, पुलिस ने अभिभावकों की जिम्मेदारी दोहराई।

दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर वही सवाल खड़ा हो गया है — क्या नाबालिगों के हाथ में वाहन की चाबी देना सिर्फ गलती है, या उससे आगे की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए?

इस महीने 23 वर्षीय साहिल धनेशरा की मौत ने शहर को झकझोर दिया। आरोप है कि क्लास दसवीं का एक छात्र SUV चला रहा था, जिसने उनकी बाइक को टक्कर मार दी। साहिल काम पर जा रहे थे। हादसे ने सिर्फ एक परिवार नहीं तोड़ा, बल्कि एक पुरानी घटना की याद भी लौटा दी।

करीब दस साल पहले, 4 अप्रैल 2016 को 32 वर्षीय मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव सिधार्थ शर्मा की मौत भी इसी तरह हुई थी। सिविल लाइंस इलाके में तेज रफ्तार मर्सिडीज, जिसे कथित तौर पर एक नाबालिग चला रहा था, ने उन्हें कुचल दिया था। उस मामले में नाबालिग के पिता की गिरफ्तारी ने एक मिसाल कायम की थी।

दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त (सेंट्रल रेंज) माधुर वर्मा, जो उस समय मामले की जांच से जुड़े थे, कहते हैं कि नाबालिग को वाहन की चाबी देना मामूली चूक नहीं, बल्कि जागरूक लापरवाही है। कानून सिर्फ किशोर तक सीमित नहीं रहता, अभिभावकों की जवाबदेही भी तय होती है।

लेकिन सिधार्थ शर्मा के परिवार के लिए न्याय की प्रक्रिया अब भी पूरी नहीं हुई है। उनकी बहन शिल्पा मित्तल बताती हैं कि अदालत से अभी तक अंतिम फैसला नहीं आया। हालिया हादसे ने उनके लिए पुराने जख्म फिर खोल दिए हैं। उनका कहना है कि इसे महज “एक्सीडेंट” कहना सही नहीं है। अगर नाबालिग गाड़ी चला रहा था और चाबी घर से मिली थी, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

आंकड़े क्या कहते हैं

दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 15 फरवरी तक नाबालिग ड्राइविंग के नौ मामलों में किशोरों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या पांच थी। पूरे पिछले साल 125 चालान काटे गए।

ट्रैफिक पुलिस का कहना है कि नियमित अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन समस्या सिर्फ सड़क पर नहीं, घर से शुरू होती है।

मोटर वाहन अधिनियम के तहत नाबालिग ड्राइवर के अभिभावक भी उत्तरदायी माने जा सकते हैं। जांच अधिकारियों के अनुसार, जहां स्पष्ट लापरवाही दिखती है और उससे मौत या गंभीर चोट होती है, वहां आपराधिक जिम्मेदारी भी तय हो सकती है।

स्पेशल सीपी (परसेप्शन मैनेजमेंट एंड मीडिया सेल) देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने साफ कहा कि विशेषाधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। अगर कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए नुकसान पहुंचाता है, तो कानून अभिभावकों को भी नहीं बख्शेगा। सड़क सुरक्षा की शुरुआत घर से होती है।

विशेषज्ञों की चिंता

रोड सेफ्टी क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इसे केवल सड़क हादसा नहीं मानते। उनका कहना है कि यह वयस्क निगरानी और प्रवर्तन की कमी का संकेत है।

सेवलाइफ फाउंडेशन के संस्थापक पियूष तिवारी ने कहा कि सोशल मीडिया पर तेज रफ्तार और स्टंट संस्कृति को जिस तरह सामान्य बनाया जा रहा है, वह जोखिम को हल्का दिखाता है। वाहन कोई प्रॉप नहीं है, यह जानलेवा मशीन है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब ऐसे मामलों में जवाबदेही से पहले बोर्ड परीक्षाओं या अन्य कारणों की चर्चा होने लगती है और आरोपी किशोर को जमानत मिलती है, तो समाज में गलत संदेश जाता है। ट्रैफिक नियम विकल्प नहीं हैं।

सवाल सिर्फ कानून का नहीं

दिल्ली में दो अलग-अलग समय पर हुई ये घटनाएं एक ही पैटर्न दिखाती हैं। वाहन चलाने की उम्र तय है, नियम स्पष्ट हैं, लेकिन परिवार और समाज के स्तर पर अनुशासन कमजोर पड़ रहा है।

हर हादसे के बाद कार्रवाई की बात होती है। लेकिन असली रोकथाम तब होगी, जब घरों में यह समझ बने कि गाड़ी की चाबी खिलौना नहीं है।

Share This Article
Leave a Comment