अमेरिका में टैरिफ को घरेलू उद्योग बचाने और राजस्व बढ़ाने के औजार के रूप में पेश किया जाता रहा है। लेकिन पेन व्हार्टन बजट मॉडल के फैकल्टी डायरेक्टर केंट स्मेटर्स इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि व्यापक स्तर पर लगाए गए टैरिफ दरअसल एक तरह का “डर्टी वैट” यानी गड़बड़ तरीके से लागू किया गया मूल्य वर्धित कर हैं, जो अर्थव्यवस्था पर ज्यादा नकारात्मक असर डालते हैं।
स्मेटर्स ने एक इंटरव्यू में कहा कि सामान्य वैट पूरी अर्थव्यवस्था पर समान रूप से लागू होता है और लोग खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाते हैं। लेकिन टैरिफ चुनिंदा वस्तुओं पर लगाए जाते हैं। इससे कंपनियां और उपभोक्ता टैक्स से बचने के लिए अपने फैसले बदलते हैं, जिससे बाजार में अक्षमता बढ़ती है।
आयात पर टैक्स, असर घरेलू उद्योग पर
स्मेटर्स के अनुसार, अमेरिका जो सामान आयात करता है, उसका लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा तैयार उपभोक्ता वस्तुएं नहीं, बल्कि ऐसे कच्चे या मध्यवर्ती इनपुट होते हैं जिनका इस्तेमाल अमेरिकी कंपनियां अपने उत्पाद बनाने में करती हैं। ऐसे में टैरिफ सीधे तौर पर अमेरिकी निर्माताओं की लागत बढ़ाते हैं।
उन्होंने उदाहरण के तौर पर Deere कंपनी का जिक्र किया। कंपनी ने बताया है कि टैरिफ के कारण 2025 वित्त वर्ष में लगभग आधा बिलियन डॉलर की अतिरिक्त लागत पड़ेगी और 2026 में यह असर 1.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। कंपनी ने इन बढ़ती लागतों को मार्जिन पर दबाव और मुनाफे में कमी से जोड़ा है। टैरिफ से बचने के लिए सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट और सोर्सिंग मॉडल में बदलाव पर भी विचार किया जा रहा है।
स्मेटर्स का तर्क है कि अगर कंपनियों को स्टील या स्क्रू जैसे कम मार्जिन वाले इनपुट खुद बनाना पड़ें, तो इससे उनकी मुख्य ताकत – उच्च मूल्य वाली बौद्धिक संपदा – पर फोकस कम हो सकता है।
कर्ज पर ‘फीडबैक इफेक्ट’ का खतरा
टैरिफ को अक्सर घाटा कम करने वाले कदम के रूप में देखा जाता है। लेकिन स्मेटर्स मानते हैं कि इसका लंबी अवधि में उल्टा असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, अभी भले ही पहले साल जीडीपी में गिरावट मामूली, करीब 0.1 प्रतिशत दिखे, लेकिन 30 साल में यह गिरावट लगभग 2.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
कारण है राष्ट्रीय कर्ज पर बढ़ता ब्याज बोझ। उनका कहना है कि जैसे-जैसे सरकार अधिक कर्ज जारी करेगी और अर्थव्यवस्था की दक्षता घटेगी, निवेशक अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न की मांग करेंगे। इससे ब्याज दरें बढ़ेंगी और कर्ज का बोझ और भारी होगा।
उन्होंने आगाह किया कि अमेरिका अगले साल करीब एक ट्रिलियन डॉलर ब्याज भुगतान करने वाला है, और यह राशि बढ़ती जा रही है। अगर यही रुझान जारी रहा तो स्थिति जापान जैसी हो सकती है, जहां राजस्व का बड़ा हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में जाता है।
कॉरपोरेट टैक्स से भी ज्यादा नुकसान?
स्मेटर्स ने तुलना करते हुए कहा कि अगर समान राजस्व जुटाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स दर 21 प्रतिशत से बढ़ाकर 29 प्रतिशत करनी पड़े, तब भी उससे होने वाला आर्थिक नुकसान टैरिफ की तुलना में कम होगा। उनके अनुमान के अनुसार, टैरिफ का असर कॉरपोरेट टैक्स बढ़ोतरी से लगभग ढाई गुना ज्यादा नकारात्मक हो सकता है।
हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वे किसी खास टैक्स बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि राजस्व जुटाने के अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी तरीके हो सकते हैं, लेकिन टैरिफ को व्यापार नीति के नाम पर लागू करना अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकाल में भारी पड़ सकता है।
कानूनी पहलू भी चर्चा में
इस बीच अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट कई टैरिफ की वैधता पर विचार कर रहा है। नवंबर में दलीलें सुनने के बाद फैसला कभी भी आ सकता है। कुछ जजों ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणियां भी की थीं।
सवाल सिर्फ व्यापार संतुलन का नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या अल्पकालिक राजस्व के लिए उठाए गए कदम लंबे समय में कर्ज और ब्याज के बोझ को और जटिल बना देंगे। स्मेटर्स की चेतावनी इसी दिशा में है – कि टैरिफ को केवल राजनीतिक या तात्कालिक समाधान के रूप में देखने के बजाय उसके व्यापक आर्थिक प्रभाव को समझना जरूरी है।


