रूस-यूक्रेन युद्ध को चार साल हो चुके हैं। इसी बीच रूस की अर्थव्यवस्था को लेकर अंदर और बाहर से सवाल उठने लगे हैं। रूस के केंद्रीय बैंक की पूर्व सलाहकार एलेक्ज़ेंड्रा प्रोकोपेंको का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जिसे वह “डेथ ज़ोन” कहती हैं—यानी ऐसी स्थिति जहां सिस्टम अभी चल तो रहा है, लेकिन धीरे-धीरे अपनी ही ताकत खत्म कर रहा है।
प्रोकोपेंको ने एक लेख में पहाड़ चढ़ाई का उदाहरण दिया। ऊंचाई पर शरीर जितनी तेजी से खुद को नुकसान पहुंचाता है, उतनी तेजी से खुद को ठीक नहीं कर पाता। उनके मुताबिक, रूस की अर्थव्यवस्था भी इसी तरह एक नकारात्मक संतुलन में फंसी है—ऊपरी तौर पर स्थिर, लेकिन भीतर से कमजोर होती हुई।
अभी संकट नहीं, लेकिन रफ्तार थमी
रिपोर्ट के मुताबिक रूस तत्काल किसी बड़े आर्थिक पतन की ओर नहीं बढ़ रहा। लेकिन जीडीपी की रफ्तार थम गई है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच तेल से होने वाली आमदनी आधी रह गई है। बजट घाटा बढ़ रहा है और सरकारी भंडार पर दबाव साफ दिख रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि देश में दो तरह की अर्थव्यवस्था बन गई है।
- पहली—रक्षा क्षेत्र और उससे जुड़ी इंडस्ट्री, जिन्हें सरकारी प्राथमिकता मिल रही है।
- दूसरी—बाकी सेक्टर, जो संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
सरकार का पैसा रक्षा उद्योगों की ओर जा रहा है। फैक्ट्रियां चल रही हैं, रोजगार भी बन रहा है, लेकिन उत्पादन का बड़ा हिस्सा टैंक, बख्तरबंद वाहन और हथियार हैं—जो युद्ध में नष्ट हो जाते हैं और आगे आर्थिक वृद्धि में योगदान नहीं देते।
इसी तरह सेना में भर्ती के लिए खर्च किया जा रहा पैसा भी लंबे समय की उत्पादक क्षमता नहीं बढ़ाता। बड़ी संख्या में सैनिक या तो मारे जा रहे हैं या स्थायी रूप से घायल होकर लौट रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक रूसी सैन्य हताहतों की संख्या 12 लाख तक पहुंच चुकी है, जिनमें लगभग 3.25 लाख की मौत हुई है।
ब्याज दरों से हल नहीं
रूस के केंद्रीय बैंक ने विकास को सहारा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की है। सरकार भी बजट घाटा नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। लेकिन प्रोकोपेंको का मानना है कि यह सामान्य आर्थिक मंदी जैसा चक्र नहीं है, जिसे मौद्रिक या राजकोषीय उपायों से जल्दी सुधारा जा सके।
सरकारी कर्ज पर ब्याज भुगतान इस साल शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुल खर्च से भी ज्यादा होने का अनुमान है। यानी संसाधनों का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज चुकाने में जा रहा है।
उनके अनुसार, यह स्थिति ऊंचाई पर होने वाली बीमारी जैसी है—जितना लंबा समय बीतेगा, असर उतना गहरा होगा।
अंदर से भी चेतावनी
हाल के महीनों में रूस के भीतर से भी चेतावनी के संकेत मिले हैं। कुछ अधिकारियों ने आशंका जताई है कि अगर तेल राजस्व कमजोर रहा और महंगाई बढ़ती रही, तो आने वाले महीनों में वित्तीय संकट का जोखिम खड़ा हो सकता है। जनवरी में तेल से आय में 50% गिरावट दर्ज की गई थी। टैक्स बढ़ाने के बाद भी बजट घाटा कम नहीं हो रहा।
मॉस्को के कारोबारी हलकों से भी संकेत मिले हैं कि रेस्तरां बंद हो रहे हैं और छंटनी बढ़ रही है। उपभोक्ता खर्च कई क्षेत्रों में घटा है। ऊंची ब्याज दरों और कमजोर मांग के कारण कंपनियों पर दबाव है। कर्ज चुकाने में भी लोगों को दिक्कत आ रही है, जिससे बैंकिंग सेक्टर पर असर पड़ सकता है।
युद्ध पर निर्भर अर्थव्यवस्था
विश्लेषकों का कहना है कि अर्थव्यवस्था अब रक्षा क्षेत्र पर इतनी निर्भर हो चुकी है कि अचानक सैन्य गतिविधियों में कमी भी झटका दे सकती है। बड़े पैमाने पर सैनिकों की वापसी या रक्षा खर्च में कटौती से आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है।
दूसरी ओर, यूक्रेन ने हाल के हफ्तों में जवाबी कार्रवाई कर कुछ इलाकों में बढ़त बनाई है। आकलन यह भी है कि रूस की सेना को जितने नए सैनिक चाहिए, उतनी भर्ती की रफ्तार नहीं है।
फिलहाल रूस युद्ध जारी रख सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक ढांचा लंबे समय तक ऐसे ही टिक पाएगा? प्रोकोपेंको का संकेत साफ है—कोई भी पर्वतारोही “डेथ ज़ोन” में अनिश्चित काल तक नहीं रह सकता।


