कैंसर का इलाज खोजने की कोशिश नई नहीं है। हजारों साल पहले प्राचीन मिस्र में भी ट्यूमर का उल्लेख मिलता है। समय बदला, विज्ञान आगे बढ़ा, लेकिन यह बीमारी आज भी चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
अब तकनीकी दुनिया का एक वर्ग मानता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस पहेली को सुलझा सकता है। कई बड़े टेक लीडर खुलकर कह रहे हैं कि AI चिकित्सा अनुसंधान की रफ्तार को कई गुना बढ़ा देगा। लेकिन दवा उद्योग का नजरिया थोड़ा अलग है।
टेक जगत का भरोसा
गूगल की अध्यक्ष रूथ पोरैट ने पिछले साल अनुमान जताया था कि AI मेडिकल रिसर्च में निर्णायक भूमिका निभाएगा। वहीं Anthropic के CEO डारियो अमोदेई ने “compressed 21st century” शब्द इस्तेमाल किया, यह बताने के लिए कि AI आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक प्रगति को तेज कर सकता है।
अमेरिका में ‘स्टारगेट प्रोजेक्ट’ जैसे बड़े निवेश भी इसी उम्मीद से जुड़े हैं। 2029 तक 500 अरब डॉलर के AI इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश की घोषणा के दौरान यह तक कहा गया कि AI की मदद से कैंसर वैक्सीन 48 घंटे में तैयार की जा सकती है।
Lilly CEO का अलग नजरिया
Eli Lilly के CEO डेविड रिक्स इस उत्साह को थोड़ा अतिरंजित मानते हैं। एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा कि मौजूदा AI मॉडल जीवविज्ञान या रसायन विज्ञान की जटिल समस्याओं को सुलझाने में खास सफल नहीं हैं।
उनका तर्क है कि अधिकतर बड़े लैंग्वेज मॉडल मानव भाषा पर प्रशिक्षित हैं। वे केमिस्ट्री, फिजिक्स और बायोलॉजी की मूलभूत जटिलताओं को उसी गहराई से नहीं समझते।
रिक्स के शब्दों में, प्रोटीन की संरचना का अनुमान लगाना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन दवा खोज की पूरी प्रक्रिया में यह शायद हजार में से एक समस्या है। बाकी चुनौतियां अभी भी वैज्ञानिक अनुसंधान पर निर्भर हैं।
फिर भी AI की भूमिका नकार नहीं सकते
यह भी सच है कि AI ने कैंसर रिसर्च में कुछ ठोस प्रगति दिखाई है।
- हार्वर्ड का ‘Sybil AI’ मॉडल 2023 में छह साल के भीतर फेफड़ों के कैंसर का जोखिम सटीकता से आंकने में सफल रहा।
- गूगल डीपमाइंड का ‘AlphaProteo’ खास अणुओं को निशाना बनाने वाले प्रोटीन बाइंडर डिजाइन करने में मददगार साबित हुआ है।
- ‘AlphaFold’ जैसी प्रणाली का उपयोग खुद Eli Lilly भी कर रही है।
यानी उद्योग पूरी तरह AI से दूरी नहीं बना रहा। बल्कि उसे एक उपकरण की तरह इस्तेमाल कर रहा है।
समाधान क्या हो सकता है?
रिक्स का मानना है कि सामान्य LLMs के बजाय खास, सीमित दायरे वाले AI मॉडल अधिक उपयोगी हो सकते हैं। ऐसे मॉडल जो विशेष जैविक डेटा पर प्रशिक्षित हों और छोटे-छोटे अनुमान आधारित सवालों को हल कर सकें।
उनके अनुसार, जीवविज्ञान मानव भाषा की तरह व्यवस्थित नियमों का पालन नहीं करता। इसलिए इसे समझने के लिए अलग दृष्टिकोण चाहिए।
अभी लंबा रास्ता
चिकित्सा क्षेत्र में बीते दशकों में बड़ी उपलब्धियां हासिल हुई हैं। फिर भी रिक्स मानते हैं कि जैविक अनुसंधान की भाषा समझने में इंसान अभी शुरुआती स्तर पर है।
AI मदद कर सकता है, लेकिन फिलहाल उसे इलाज का अंतिम समाधान मान लेना जल्दबाजी हो सकती है।


