मुंबई में AP Dhillon के कॉन्सर्ट के दौरान मंच पर जो हुआ, वह अपने आप में कोई खबर नहीं थी। खबर उसके बाद बनी। एक छोटा सा ऑन-स्टेज मोमेंट, एक अपनापन भरा हग, गाल पर हल्की सी पेक—और फिर तारा सुतारिया वापस दर्शकों के बीच चली गईं। लेकिन इंटरनेट यहीं नहीं रुका। उसने उस पल को समझने के बजाय एक महिला को कटघरे में खड़ा कर दिया।
कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर क्लिप वायरल हो गई। कैमरा तारा के पार्टनर वीर पहाड़िया पर गया। उनके चेहरे के एक्सप्रेशन को स्लो मोशन में देखा गया, फ्रेम दर फ्रेम पढ़ा गया। फैसले तुरंत सुनाए गए—वह असहज थे, नाराज़ थे, अपमानित महसूस कर रहे थे। और फिर आरोप तारा पर आए। सीमा लांघ दी। सम्मान नहीं रखा। सफाई देनी चाहिए।
यही वह जगह है जहां एक सामान्य पल “कहानी” बन जाता है। और अक्सर, उस कहानी का बोझ एक महिला पर ही डाला जाता है।
आज के समय में वीडियो एडिट करना कोई खास स्किल नहीं रह गया है। क्लिप को काटना, म्यूज़िक जोड़ना, एक सेकंड को पूरे सच की तरह पेश करना—सब आसान है। हम यह जानते भी हैं। फिर भी हम एक एडिटेड वीडियो पर भरोसा कर लेते हैं और एक महिला की नीयत पर सवाल उठाने लगते हैं। अफवाहें तर्क से ज्यादा भरोसेमंद लगने लगती हैं।
सच यह है कि यह नया नहीं है। फर्क बस इतना है कि इंटरनेट ने जजमेंट को और तेज़, और ज़्यादा सार्वजनिक बना दिया है। एक महिला कैसे खाती है, कैसे बैठती है, कैसे दिखती है, किससे मिलती है—हर चीज़ पर राय तैयार रहती है। शादी जल्दी हो या देर से, खुलकर डेट करे या निजी रखे—कोई भी विकल्प इंटरनेट की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
इस पूरे मामले को और असहज बनाता है यह तथ्य कि कई सवाल दूसरी महिलाओं की तरफ से भी आए। कमेंट सेक्शन में तारा की गरिमा, उसकी सीमाएं और उसकी ‘लॉयल्टी’ पर फैसले सुनाए गए। यह दिखाता है कि पितृसत्ता सिर्फ पुरुष आवाज़ों से नहीं चलती, वह कई बार भीतर बैठी सोच से भी आगे बढ़ती है।
Tara Sutaria hugs and kisses AP Dhillon while her poor bf Veer Pahariya is watching them in audience.
If the roles were reversed and Veer was doing this to another girl while Tara watched, the internet would have cancelled him in 5 minutes . pic.twitter.com/4QV7u3P7OH
— Aman katiyar (@cric_cine_med) December 27, 2025
इस शोर के बीच वीर पहाड़िया का रुख अलग रहा। उन्होंने अफवाहों, पेड पीआर और बनावटी नाराज़गी की बात कहकर साफ किया कि वह उस महिला पर भरोसा करते हैं जिसे वह जानते हैं, न कि उस क्लिप पर जिसे अजनबियों ने काट-छांट कर पेश किया। बिना कोई बड़ा बयान दिए, उन्होंने बहुत कुछ कह दिया।
असल में यह विवाद न तो हग को लेकर था, न ही उस पेक को लेकर। यह नियंत्रण की भावना को लेकर था। इस बात को लेकर कि सार्वजनिक जगह पर एक महिला अपने भाव कैसे ज़ाहिर करे। पुरुष कलाकार मंच पर खुले तौर पर इंटरैक्ट करते हैं, लेकिन उनकी निजी ज़िंदगी पर माइक्रोस्कोप नहीं लगाया जाता। वही आज़ादी जब एक महिला लेती है, तो उसका चरित्र चर्चा में आ जाता है।
यह लगातार निगरानी महिलाओं को सिखाती है कि वे खुद को सीमित रखें। हर कदम सोच-समझकर रखें। और जब कोई महिला ऐसा करने से इनकार करती है, तो सज़ा तुरंत मिलती है।
तारा सुतारिया ने कोई विवाद नहीं खड़ा किया। वह बस एक आईना बन गईं। एक ऐसा आईना, जिसमें दिखा कि हम कितनी जल्दी एक महिला को अपनी असहजता के मुताबिक कहानी में बदल देते हैं। असली सवाल मंच पर क्या हुआ, यह नहीं है। सवाल यह है कि उसके बाद हमने ऑनलाइन क्या किया।
शायद अगली बार कोई क्लिप वायरल हो, तो यह पूछना ज़रूरी हो—उसने क्या गलत किया, नहीं। बल्कि यह कि हम उसे गलत साबित करने के लिए इतने उतावले क्यों हैं।


