Apple की AI रणनीति: पीछे रहना या सोच-समझकर इंतज़ार?

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां जहां AI पर अरबों डॉलर झोंक रही हैं, वहीं Apple अपेक्षाकृत शांत है। सवाल यह है कि क्या यह देरी है या एक अलग रणनीति?

Virat
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AI निवेश की वैश्विक दौड़ के बीच Apple ने अलग राह चुनी है, जो रणनीतिक मानी जा रही है

टेक इंडस्ट्री में इस समय एक तरह की दौड़ लगी है। Google इस साल AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 90 अरब डॉलर खर्च करने जा रहा है। Meta ने 65 अरब डॉलर का बजट तय किया है। Microsoft, Amazon और Alphabet मिलकर 300 अरब डॉलर से अधिक निवेश कर रहे हैं। इसके मुकाबले Apple पूरे वित्तीय वर्ष में सिर्फ 12.7 अरब डॉलर का पूंजीगत व्यय कर रहा है।

बाजार में यह धारणा बन रही है कि Apple AI की रेस में पीछे छूट रहा है। Siri को लेकर लगातार आलोचना होती रही है। AI-सक्षम असिस्टेंट के अपग्रेड में भी देरी हुई है, जो अब 2026 तक खिंच गया है। कुछ विश्लेषकों ने तो Apple की AI रणनीति को “फेलियर” तक बताया है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।

क्या AI मॉडल ‘कमोडिटी’ बन रहे हैं?

AI के मूल मॉडल—जिन्हें फाउंडेशन मॉडल कहा जाता है—अब तेजी से एक जैसे होते दिख रहे हैं। एक कंपनी नई क्षमता लाती है, दूसरी कुछ महीनों में वैसा ही फीचर दे देती है। लीडर बदलते रहते हैं। कीमतें लगातार गिर रही हैं। हाल में Anthropic ने दाम 67% घटाए, Google ने 70–80% तक कटौती की और OpenAI भी कई बार कीमतें कम कर चुका है।

ऐसा माहौल आम तौर पर कमोडिटी मार्केट में दिखता है—जहां उत्पाद लगभग समान हो जाते हैं और प्रतिस्पर्धा कीमत पर आ टिकती है।

अगर AI मॉडल इसी दिशा में जाते हैं, तो असली ताकत उस कंपनी के पास होगी जो यूजर तक पहुंच और अनुभव को नियंत्रित करती है।

Apple की असली ताकत क्या है?

Apple के पास 2.4 अरब सक्रिय डिवाइस हैं। यह खुद में एक विशाल वितरण नेटवर्क है। कंपनी ने अभी तक खुद का बड़ा फाउंडेशन मॉडल बनाने के बजाय पार्टनरशिप का रास्ता चुना है। 2024 में उसने OpenAI के साथ काम किया और बाद में अगली पीढ़ी की Siri के लिए Google के Gemini मॉडल को अपनाया।

यानी Apple इंजन खुद नहीं बना रहा, बल्कि जो उस समय बेहतर हो, उसे चुनकर अपने इकोसिस्टम में जोड़ रहा है। कंपनी का फोकस मॉडल नहीं, अनुभव पर है।

यह Apple के पुराने व्यवहार से अलग नहीं है। MP3 प्लेयर, स्मार्टवॉच, वायरलेस ईयरबड्स या स्मार्टफोन—इनमें से किसी में भी Apple पहला खिलाड़ी नहीं था। लेकिन जब वह आया, तो बेहतर इंटीग्रेशन और अनुभव के साथ आया। iPod, iPhone और AirPods इसके उदाहरण हैं।

Apple का AI मॉडल कैसा हो सकता है?

ChatGPT, Claude या Gemini जैसे प्रोडक्ट्स में AI खुद एक गंतव्य है—आप वेबसाइट पर जाते हैं और AI से बातचीत करते हैं। Apple का तरीका अलग हो सकता है। वहां AI एक ‘अदृश्य इंफ्रास्ट्रक्चर’ की तरह काम करे—Siri, Photos, Mail, Apple TV, Watch या CarPlay के भीतर, बिना अलग से दिखे।

कंपनी तकनीक को बेचने के बजाय अनुभव बेचती है। संभव है कि वह AI को भी उसी ढांचे में ढाले।

प्राइवेसी का पहलू

Apple लंबे समय से ऑन-डिवाइस प्रोसेसिंग और प्राइवेसी को अपनी पहचान बनाता रहा है। उसकी Private Cloud Compute जैसी संरचनाएं इस बात की कोशिश हैं कि यूजर डेटा बड़े पैमाने पर क्लाउड में इकट्ठा न करना पड़े।

जैसे-जैसे लोग अपने निजी डेटा पर AI के उपयोग को लेकर सतर्क हो रहे हैं, यह एक अलग पहचान बन सकता है। क्लाउड-आधारित कंपनियों के लिए इस मॉडल की नकल करना आसान नहीं होगा।

जोखिम भी मौजूद है

यह भी संभव है कि AI मॉडल कमोडिटी न बनें। अगर नेटवर्क इफेक्ट, डेटा या तकनीकी बढ़त कुछ कंपनियों को स्थायी बढ़त दे देती है, तो Apple को भविष्य में उन्हीं पर निर्भर रहना पड़ सकता है। यह रणनीतिक जोखिम है।

हालांकि Apple की वित्तीय स्थिति मजबूत है। कंपनी के पास 130 अरब डॉलर से ज्यादा नकदी है। वार्षिक राजस्व 416 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर है और मुनाफा लगभग 100 अरब डॉलर के करीब पहुंच रहा है। अगर AI निवेश का मौजूदा उछाल धीमा पड़ता है, तो Apple के पास अधिग्रहण या बड़े निवेश का विकल्प खुला रहेगा।

असली सवाल

Apple और बाकी टेक कंपनियों के बीच खर्च का अंतर साफ है। लेकिन इसे दूरदर्शिता कहा जाएगा या चूक—यह इस बात पर निर्भर करेगा कि AI मॉडल भविष्य में कितने अलग और टिकाऊ साबित होते हैं।

फिलहाल संकेत यही हैं कि Apple दौड़ में शामिल जरूर है, पर अपने तरीके से। अगर AI सचमुच एक बुनियादी ढांचा बनकर रह जाता है, तो संभव है कि कंपनी फिर देर से आए और इंटीग्रेशन के दम पर बाजी मार ले।

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