आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ टेक सेक्टर की बात नहीं रह गई है। दफ्तरों में AI असिस्टेंट, ऑटोमेशन और एल्गोरिदम तेजी से जगह बना रहे हैं। इसका असर यह है कि पिछले साल ही दुनिया भर में 54 हजार से ज्यादा जॉब कट्स का ऐलान हुआ। इसी बदलते माहौल में Citigroup की CEO जेन फ्रेज़र ने अपने कर्मचारियों को लेकर एक साफ रुख अपनाया है—बदलाव से डरने के बजाय, उसके लिए तैयार होना।
दावोस में वॉशिंगटन पोस्ट से बातचीत में जेन फ्रेज़र ने कहा कि AI बड़े पैमाने पर बदलाव लाने वाला है। उनके मुताबिक, यह ऐसी नई नौकरियां भी पैदा करेगा जिनके बारे में आज हम सोच भी नहीं सकते, लेकिन साथ ही कुछ मौजूदा रोल्स खत्म भी होंगे। यानी काम का तरीका पूरी तरह बदलने वाला है।
इसी सोच के तहत सिटीग्रुप ने पिछले साल 80 से ज्यादा लोकेशनों में काम कर रहे अपने करीब 1.75 लाख कर्मचारियों के लिए AI ट्रेनिंग अनिवार्य कर दी। इस ट्रेनिंग का फोकस खास तौर पर “प्रॉम्प्टिंग” पर है—यानी AI टूल्स से सही सवाल पूछना और बेहतर नतीजे निकालना। कंपनी का मानना है कि इससे कर्मचारियों के मन में AI को लेकर जो डर या झिझक है, वह कम होगी और वे इसे अपने काम का हिस्सा बना पाएंगे।
जेन फ्रेज़र का कहना है कि यह ट्रेनिंग सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी में भी काम आने वाली स्किल है। उनके शब्दों में, मकसद यह है कि कर्मचारी खुद को बेबस महसूस न करें, बल्कि उन्हें लगे कि उनके हाथ में भी कंट्रोल है। उन्होंने कर्मचारियों को साफ संदेश दिया है—AI आपकी नौकरी नहीं छीनेगा, लेकिन AI का सही इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति शायद आपसे बेहतर काम कर सके। ऐसे में जरूरी है कि आप भी उस तकनीक को सीखें।
कंपनी के लिए भी यह रणनीति फायदे की है। सिटीग्रुप में लगभग 50% नई भर्तियां अंदर से ही होती हैं और कई कर्मचारी दशकों तक यहीं काम करते हैं। ऐसे में मौजूदा स्टाफ को नई स्किल्स सिखाना, बाहर से नई भर्ती करने के मुकाबले ज्यादा व्यावहारिक और किफायती है।
सिटी के लर्निंग हेड पीटर फॉक्स के मुताबिक, यह ट्रेनिंग कर्मचारियों के स्तर के हिसाब से डिजाइन की गई है। जो पहले से एक्सपर्ट हैं, वे इसे कुछ ही मिनटों में पूरा कर लेते हैं, जबकि शुरुआती लोगों को थोड़ा ज्यादा वक्त लगता है। अब तक कर्मचारी कंपनी के इन-बिल्ट AI टूल्स में लाखों प्रॉम्प्ट डाल चुके हैं और कई ऐसे काम, जो पहले घंटों लेते थे, अब मिनटों में हो रहे हैं।
कंपनी का कहना है कि AI टूल्स को अपनाने की दर करीब 70% तक पहुंच चुकी है और 80 से ज्यादा देशों में सिटी के कर्मचारी इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे एक भरोसा भी बना है कि AI को “रिप्लेसमेंट” नहीं, बल्कि “को-पायलट” की तरह देखा जा रहा है।
काम की दुनिया तेजी से बदल रही है। सिटीग्रुप का यह कदम दिखाता है कि सवाल सिर्फ नौकरियां जाने या बचने का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि कर्मचारी खुद को उस बदलाव के लिए कितना तैयार कर पाते हैं।


