घाटी मूवी रिव्यू: अनुष्का शेट्टी की दमदार वापसी, क्राइम-एक्शन और सामाजिक संदेश का संगम

क्रिश जगर्लामुड़ी की फिल्म ‘घाटी’ बदले और सामाजिक न्याय की कहानी को एक साथ पिरोने की कोशिश करती है, लेकिन क्या यह दोनों मोर्चों पर खरी उतरती है?

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घाटी मूवी रिव्यू: अनुष्का शेट्टी की दमदार वापसी

अनुष्का शेट्टी की बहुप्रतीक्षित फिल्म घाटी आखिरकार रिलीज हो गई है। निर्देशक क्रिश जगर्लामुड़ी ने इस बार बदले की कहानी को सामाजिक असमानता और जनजातीय संघर्ष जैसे गहरे मुद्दों से जोड़ने का प्रयास किया है। फिल्म में जहां एक ओर खून-खराबे से भरी बदले की दास्तान है, वहीं दूसरी ओर एक महिला नायक के कंधों पर पूरी समुदाय की आज़ादी का जिम्मा भी डाला गया है।

मुख्य तथ्य

  • फिल्म में अनुष्का शेट्टी ने शीलावती का दमदार किरदार निभाया है।
  • कहानी आंध्र-ओडिशा बॉर्डर (AOB) की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
  • बदला और सामाजिक मुक्ति—दो विचारों को एक साथ समेटने की कोशिश।
  • सिनेमैटोग्राफी और संवादों में स्थानीय संस्कृति का अच्छा चित्रण।
  • क्लाइमेक्स भव्य है, लेकिन अंतिम 45 मिनट कमजोर पड़ते हैं।

घाटी  की कहानी शीलावती (अनुष्का शेट्टी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपराधियों और सत्ता से टकराती है। पहले हिस्से में फिल्म एक सशक्त क्राइम-एक्शनर की तरह सामने आती है, जिसमें हिंसा और प्रतिशोध की धारा दर्शकों को बांधे रखती है। लेकिन जैसे ही कहानी सामाजिक न्याय और पूरे आदिवासी समुदाय की मुक्ति की ओर मुड़ती है, नैरेटिव थोड़ा असंतुलित हो जाता है।

अनुष्का शेट्टी की फिल्म बदले और सामाजिक संदेश का संगम है
अनुष्का शेट्टी की फिल्म बदले और सामाजिक संदेश का संगम है

निर्देशक क्रिश हमेशा से सामाजिक मुद्दों को अपनी फिल्मों में बड़े कैनवास पर पेश करते रहे हैं—गम्यम, वेदम और कांचे इसकी मिसाल हैं। इस बार उन्होंने भारत के पूर्वी घाटों और गांजा तस्करी के इर्द-गिर्द कहानी बुनी है। फिल्म यह दिखाती है कि कैसे कॉरपोरेट्स, अपराध सरगना और भ्रष्ट नेता जनजातीय समुदायों का शोषण करते हैं।

प्रदर्शन और तकनीकी पहलू

अनुष्का शेट्टी लंबे समय बाद बड़े पर्दे पर लौटी हैं और उनका स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। विक्रम प्रभु ने उनके मंगेतर देशी राजू की भूमिका में शानदार संतुलन दिखाया है। रोमांस के दृश्य फिल्म को भावनात्मक एंकर प्रदान करते हैं।

चैतन्य राव मद्दी एक खतरनाक सायको किरदार में असर छोड़ते हैं, लेकिन बाकी खलनायक सतही लगते हैं। जगपति बाबू का सुपरकॉप वाला ट्रैक भी अनावश्यक प्रतीत होता है।

सिनेमैटोग्राफर मनोज रेड्डी ने AOB की खूबसूरती और संस्कृति को बिना अतिरंजना के कैद किया है। संवाद भी स्थानीय संवेदनाओं को मजबूती से सामने रखते हैं।

कमजोरियां और निष्कर्ष

फिल्म का सबसे बड़ा दोष इसका असंतुलन है। पहला हिस्सा जहां दमदार और रोमांचक है, वहीं आखिरी 45 मिनट बोझिल और जल्दबाजी में समेटे गए लगते हैं। नतीजा यह होता है कि फिल्म का सामाजिक संदेश उतना प्रभावी नहीं बन पाता।

फिर भी, घाटी अनुष्का शेट्टी की पावरफुल वापसी के लिए देखी जा सकती है। क्रिश की यह कोशिश भले अधूरी लगे, लेकिन यह एक यादगार सिनेमैटिक अनुभव जरूर देती है।

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