वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद दुनिया की प्रतिक्रिया साफ तौर पर दो हिस्सों में बंट गई। कुछ देशों ने अमेरिका की कड़ी निंदा की, तो कुछ ने उसका समर्थन किया। लेकिन भारत ने न तो किसी का साथ दिया और न ही खुला विरोध किया। नई दिल्ली का यह रुख कई लोगों के लिए सवाल बना, खासकर ऐसे समय में जब भारत खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज़ के तौर पर पेश करता रहा है।
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लिए जाने के बाद मलेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। भारत ने इससे अलग रास्ता चुना—संयम का।
भारत ने क्या कहा
अमेरिकी कार्रवाई के अगले दिन विदेश मंत्रालय ने एक संक्षिप्त बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि वेनेजुएला में हालात “गंभीर चिंता” का विषय हैं और भारत स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है। बयान में न अमेरिका का नाम लिया गया, न किसी तरह की निंदा की गई।
इसके बाद लक्ज़मबर्ग में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी यही रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि सभी पक्षों को वेनेजुएला के लोगों की सुरक्षा और भलाई को प्राथमिकता देनी चाहिए। संदेश साफ था—फोकस जनता पर है, न कि किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध पर।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
दक्षिण एशियाई राजनीति के जानकार माइकल कुगेलमैन का मानना है कि भारत का यह रुख चुप समर्थन नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच का नतीजा है। उनके मुताबिक, कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अमेरिका से जुड़े व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दे संवेदनशील हैं, इसलिए सार्वजनिक बयान सोच-समझकर दिए जाते हैं।
वहीं रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हापिमोन जैकब कहते हैं कि भारत ने पहले भी बड़े सैन्य हस्तक्षेपों पर सार्वजनिक निंदा से दूरी बनाए रखी है। चाहे यूक्रेन पर रूस का हमला हो या अब वेनेजुएला का मामला—भारत का मानना है कि बड़ी शक्तियां अपने प्रभाव क्षेत्र में काम करती हैं। नई दिल्ली को आपत्ति तब होती है, जब उससे किसी एक पक्ष की खुली निंदा करने का दबाव बनाया जाता है।
उनके अनुसार, अमेरिका और रूस—दोनों भारत के लिए अहम साझेदार हैं। ऐसे में जब कोई करीबी देश विवादास्पद कदम उठाता है, तो भारत “मेगाफोन डिप्लोमेसी” के बजाय चुपचाप अपने संवाद के रास्ते खुले रखना पसंद करता है।
ग्लोबल साउथ और तुलना का सवाल
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने अमेरिकी कदम को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और राष्ट्रपति मादुरो की तुरंत रिहाई की मांग की। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने भी वीडियो बयान जारी कर अमेरिका की आलोचना की।
इन प्रतिक्रियाओं के बाद भारत में भी सवाल उठे कि क्या ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने वाला देश इतनी मजबूत भाषा अपना सकता था। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि भारत को निंदा जरूरी नहीं थी, लेकिन संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ सिद्धांतों की याद जरूर दिलाई जा सकती थी।
गैर-गुटनिरपेक्षता की विरासत
भारत का यह रुख नया नहीं है। फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने निंदा से दूरी बनाई और बातचीत व कूटनीति पर जोर दिया। यह परंपरा देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय से चली आ रही है।
1957 में संसद में नेहरू ने कहा था कि हर गलत घटना पर निंदा करना समाधान नहीं होता। इतिहासकारों के मुताबिक, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, अफगानिस्तान या इराक—भारत ने दशकों से बड़े सैन्य हस्तक्षेपों पर सार्वजनिक आलोचना से बचने की नीति अपनाई है।
संतुलन की राजनीति
वेनेजुएला मामले में भारत का संयम इसी सोच का विस्तार है। नई दिल्ली मानती है कि खुली निंदा से ज्यादा जरूरी है अपने हितों की रक्षा, संवाद के रास्ते खुले रखना और शांति की बात करते रहना।
इसलिए भारत ने न तो अमेरिका के पक्ष में खड़े होने का फैसला किया और न ही विरोध की अगुवाई की। यह रुख कई लोगों को असहज लग सकता है, लेकिन भारत की विदेश नीति में इसे व्यावहारिक संतुलन और लंबे अनुभव से निकली रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।


