U-19 World Cup जीतने वाली टीम इंडिया: 15 किशोर, एक यादगार पल

हरारे की शाम, हाथों में ट्रॉफी और आंखों में भविष्य — अंडर-19 वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम की कहानी सिर्फ स्कोरकार्ड की नहीं है।

Virat
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भारत के युवा चैंपियन

शुक्रवार की शाम हरारे के आसमान के नीचे 15 किशोर खिलाड़ी एक साथ खड़े थे। हाथों में वर्ल्ड कप ट्रॉफी थी और चेहरों पर वह ठहराव, जो किसी लंबे सफर के बाद आता है। किसी ने कभी जनरल डिब्बे में बैठकर क्रिकेट अकादमी तक का सफर तय किया था, तो कोई अपने पिता का अधूरा सपना कंधों पर लेकर मैदान में उतरा था। उस पल में, उनकी सारी जद्दोजहद कुछ देर के लिए थम गई।

इतिहास अब इस टीम को एक ही तस्वीर में याद रखेगा — पोडियम पर खड़े खिलाड़ी, ट्रॉफी को थामे हुए, और सामने खुला हुआ पूरा भविष्य। यह वह पल है, जो करियर चाहे जैसे भी मोड़ ले, इन 15 खिलाड़ियों को उम्र भर जोड़कर रखेगा। टैग लग चुका है — “2026 की विजेता टीम”

इस जीत का चेहरा: वैभव सूर्यवंशी

हर अंडर-19 वर्ल्ड कप की एक पहचान होती है।
2000 में युवराज सिंह, 2008 में विराट कोहली।
इस बार यह पहचान 14 साल के वैभव सूर्यवंशी हैं।

फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ महज 80 गेंदों में 175 रन की पारी खेलकर वैभव ने न सिर्फ मैच का रुख बदला, बल्कि खुद को भारतीय क्रिकेट की चेतना में दर्ज करा दिया। भारत ने फाइनल 100 रन से जीता, लेकिन इस जीत की तस्वीर में वैभव सबसे आगे दिखे। इस टूर्नामेंट के पोस्टर बॉय वही हैं।

टीम में कुछ खिलाड़ी पहले से सुर्खियों में हैं, कुछ आईपीएल कॉन्ट्रैक्ट पर हैं, कुछ छोटे क्रिकेटिंग इलाकों से आए हैं। आगे चलकर कोई सुपरस्टार बनेगा, कोई शायद गुमनाम हो जाएगा। लेकिन यह पल — यह जीत — सबकी कहानी में हमेशा समान रहेगी।

एक जीत, कई कहानियां

यह भारत का पांचवां अंडर-19 वर्ल्ड कप खिताब है। यह सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि उस गहराई की याद दिलाता है, जो भारतीय क्रिकेट सिस्टम में अब साफ दिखती है। जूनियर स्तर पर लगातार सफलता और सीनियर टीम का टी20 चैंपियन होना — दोनों मिलकर यह बताते हैं कि प्रतिभा अब रास्ते में खो नहीं जाती।

एक वक्त था जब क्रिकेट समाज की कई दरारों के पार जाकर लोगों को जोड़ता था। ढाई दशक बाद, तस्वीर बदल चुकी है। अब सिस्टम इतना फैला और मजबूत है कि हुनर, चाहे कहीं से आए, छूटने नहीं पाता।

समस्तीपुर से हरारे तक

वैभव सूर्यवंशी की कहानी इसी बदलते सिस्टम की मिसाल है।
बिहार के समस्तीपुर जिले से निकलकर इस मंच तक पहुंचना किसी और दौर में लगभग असंभव होता।

समस्तीपुर का उनका गांव, ताजपुर, स्टेट हाईवे 49 के पास एक छोटा सा नाम भर है। न बड़े स्टेडियम, न चमक-दमक। आसपास कुछ सरकारी अस्पताल, मंदिर, एक पेट्रोल पंप और दो स्कूल। समस्तीपुर की क्रिकेट अकादमी में भी सुविधाएं बेहद सीमित हैं।

वैभव के पिता संजीव, हफ्ते में तीन दिन अपने 10 साल के बेटे और उसके भाई को सड़क मार्ग से पटना ले जाते थे, ताकि वह टर्फ विकेट पर अभ्यास कर सके। उस समय बिहार क्रिकेट एसोसिएशन लंबे विवादों के बाद घरेलू क्रिकेट में लौटी ही थी और अंदरूनी खींचतान अब भी खत्म नहीं हुई थी।

मोड़, जो जल्दी आ गया

वैभव के करियर का बड़ा मोड़ तब आया, जब आईपीएल फ्रेंचाइजी राजस्थान रॉयल्स के स्काउट्स ने उन्हें एक कैंप में देखा। ट्रायल के लिए बुलाया गया। वहीं, वैभव ने पूर्व श्रीलंकाई दिग्गज और उस वक्त टीम डायरेक्टर कुमार संगकारा को प्रभावित कर दिया।

संगकारा ने बाद में राजस्थान रॉयल्स के एक पॉडकास्ट में याद किया कि उन्हें एक एनालिस्ट का मैसेज मिला था — “एक बहुत खास खिलाड़ी है, जिस पर नजर डालनी चाहिए।”
गुवाहाटी में नेट्स के वीडियो देखने के बाद और फिर सीधे साइन किए जाने के बाद, वैभव को लाइव देखा गया। जॉफ्रा आर्चर जैसे तेज गेंदबाजों के सामने भी उन्होंने बल्लेबाजी को बेहद आसान बना दिया।

आगे का रास्ता

इस टीम के सामने अब लंबा रास्ता है। हर खिलाड़ी का सफर अलग होगा। कोई जल्दी पहचान बना लेगा, कोई संघर्ष करेगा। लेकिन हरारे की उस शाम ने सबको एक साझा पहचान दे दी है।

यह जीत सिर्फ अंडर-19 वर्ल्ड कप की नहीं है।
यह उस भरोसे की जीत है कि भारतीय क्रिकेट में अब प्रतिभा अकेली नहीं पड़ती।

 

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