देश के सबसे साफ शहर का तमगा इंदौर को कई बार मिला है। सड़कें, कचरा प्रबंधन और रैंकिंग—सब कुछ मॉडल बताया जाता रहा। लेकिन भागीरथपुरा बस्ती में जो हुआ, उसने इस चमकदार छवि के नीचे छिपी एक गंभीर सच्चाई सामने रख दी है। यहां नलों से आया पानी लोगों के लिए जीवन नहीं, बीमारी और मौत का कारण बन गया।
पिछले कुछ दिनों में इस बस्ती में आठ लोगों की मौत हो चुकी है। 200 से ज्यादा लोग डायरिया से पीड़ित हैं। स्वास्थ्य विभाग फिलहाल तीन मौतों को ही डायरिया से जोड़ रहा है, लेकिन ज़मीनी हालात इससे कहीं ज्यादा गंभीर तस्वीर दिखाते हैं। अभी भी 111 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं और एक हजार से अधिक लोगों का इलाज किया जा चुका है।
कैसी बस्ती है भागीरथपुरा
भागीरथपुरा इंदौर की पुरानी अवैध बस्तियों में गिनी जाती है। करीब 50 साल पहले यहां भट्टे थे। बाद में प्लॉट काटे गए और धीरे-धीरे घनी आबादी बसती चली गई। न तो शुरुआत में ड्रेनेज की कोई योजना थी, न पेयजल की। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, वैसे-वैसे अधूरे और बिना प्लान के काम होते चले गए।
बैकलेन न होने के कारण सड़क किनारे ही नर्मदा की पाइपलाइन और ड्रेनेज लाइन डाल दी गई। यही फैसला आज सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आया है।
पुरानी लाइनें, नई आफ़त
बस्ती की पेयजल लाइनें 30 साल से ज्यादा पुरानी हैं। शिकायतें कोई नई नहीं थीं। स्थानीय लोग बताते हैं कि सालभर से पानी की गुणवत्ता खराब थी और पिछले एक महीने से लगातार गंदा पानी आ रहा था। लोग मजबूरी में पानी उबालकर पी रहे थे।
नगर निगम के जिस जोन में भागीरथपुरा आता है, वह गंदे पानी की शिकायतों में शहर में दूसरे नंबर पर है। दो महीनों में सबसे ज्यादा शिकायतें यहीं से आईं, लेकिन समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
महापौर परिषद ने अगस्त में लाइन बदलने की मंजूरी दी थी, लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ी। ड्रेनेज की मुख्य लाइन तो डाल दी गई, पर उससे जोड़ने वाली पुरानी लाइनें अब तक जस की तस पड़ी रहीं।
STORY | Indore water contamination: Residents claim 8 deaths; authorities confirm 3
Local residents have claimed that eight persons have died due to vomiting and diarrhoea after allegedly consuming contaminated water in Indore, though the administration has confirmed three… pic.twitter.com/pcPLt77f2E
— Press Trust of India (@PTI_News) December 31, 2025
कैसे मिला गंदा पानी
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि नर्मदा पाइपलाइन के ऊपर शौचालय बन गया। यहीं से ड्रेनेज का पानी पेयजल लाइन में मिलने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा, दूरसंचार कंपनी की खुदाई के दौरान भी लीकेज की शिकायतें पहले आती रही हैं, लेकिन उनकी जांच नहीं की गई।
नतीजा यह हुआ कि गंदा पानी सीधे घरों तक पहुंचता रहा और एक सप्ताह के भीतर हालात बेकाबू हो गए।
कार्रवाई हुई, लेकिन सवाल बाकी
घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया। जोनल अधिकारी शालिग्राम सितोले और सहायक यंत्री योगेश जोशी को निलंबित किया गया। पीएचई के प्रभारी उपयंत्री शुभम श्रीवास्तव की सेवा समाप्त कर दी गई।
लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है—जब शिकायतें पहले से थीं, तो मौतों का इंतजार क्यों किया गया? क्या केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई से समस्या हल हो जाएगी?
आंकड़ों में त्रासदी
- 111 मरीज अब भी अस्पतालों में भर्ती
- 1,000 से ज्यादा लोगों का इलाज हो चुका
- 5,000 से अधिक लोगों की जांच
- 100 से ज्यादा घरों से पानी के सैंपल
- 15 साल से गंदे पानी की समस्या
- 15,000 से ज्यादा रहवासी प्रभावित
सिर्फ भागीरथपुरा की बात नहीं
भागीरथपुरा में मौतें हुईं, इसलिए मामला सामने आया। लेकिन शहर के और भी ऐसे इलाके हैं, जहां पुरानी और कमजोर लाइनों से इसी तरह दूषित पानी बह रहा है। सवाल सिर्फ एक बस्ती का नहीं, पूरे सिस्टम का है—क्या सफाई की रैंकिंग के पीछे बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी हो रही है?


