ईरान युद्ध के बीच तेल बाजार शांत, पर खतरा बरकरार

होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद जैसा हाल; सप्ताह के अंत तक सप्लाई बहाल न हुई तो कीमतें तेज उछल सकती हैं

Virat
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ईरान युद्ध के बीच तेल बाजार शांत, खतरा कायम

अमेरिका और इज़राइल के हमलों के बाद ईरान में हालात तेजी से बदले हैं। क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है, जवाबी कार्रवाई जारी है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य लगभग ठप जैसा है। इसके बावजूद वैश्विक तेल बाजार की शुरुआती प्रतिक्रिया सीमित रही। 2 मार्च को कच्चे तेल की कीमतों में करीब 6% की बढ़त दर्ज हुई, जो हालात को देखते हुए अपेक्षाकृत कम मानी जा रही है।

ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि बाजार फिलहाल इंतजार की मुद्रा में है। उनका आकलन है कि अगर कुछ ही दिनों में तेल और गैस की आवाजाही दोबारा सामान्य नहीं हुई, तो कीमतों में तेज उछाल देखा जा सकता है।

होर्मुज़ क्यों अहम है

होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के तेल और गैस प्रवाह का सबसे बड़ा ‘चोक पॉइंट’ है। हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल और वैश्विक निर्यात का लगभग 20% इसी रास्ते से गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, ईरान, कुवैत, कतर और यूएई जैसे देश इस मार्ग पर निर्भर हैं।

औपचारिक तौर पर सप्लाई बंद नहीं है, लेकिन हालात सामान्य भी नहीं हैं। कुछ तेल टैंकर क्षतिग्रस्त हुए हैं। कई बीमा कंपनियां जोखिम के कारण जहाजों को कवर देने से हिचक रही हैं। सऊदी अरब और कुवैत की कुछ रिफाइनरियों को हल्का नुकसान हुआ है। कतर ने अस्थायी रूप से अपने गैस निर्यात का बड़ा हिस्सा रोक दिया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका या अन्य ताकतें समुद्री सुरक्षा की गारंटी देती हैं और बीमा कवरेज बहाल होता है, तो टैंकर फिर से चलने लगेंगे। अभी अनिश्चितता ही सबसे बड़ा कारक है।

बाजार की ‘संयमित’ प्रतिक्रिया

ऊर्जा शोध फर्मों से जुड़े विश्लेषकों का मानना है कि अब तक तेल और गैस के उत्पादन ठिकानों पर सीधे हमले नहीं हुए हैं। यही वजह है कि बाजार में घबराहट सीमित रही। निवेशक फिलहाल यह देखना चाहते हैं कि ऊर्जा ढांचे को सीधे निशाना बनाया जाता है या नहीं।

2 मार्च को अमेरिकी बेंचमार्क कच्चा तेल लगभग 67 डॉलर से बढ़कर 71 डॉलर प्रति बैरल पहुंचा। साल की शुरुआत में यह करीब 57 डॉलर था। यानी वर्ष की शुरुआत से अब तक करीब 25% की बढ़त हो चुकी है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि साल की शुरुआत में कीमतें महामारी के बाद के सबसे निचले स्तरों में थीं, क्योंकि वैश्विक स्तर पर सप्लाई अधिक थी।

पेट्रोल-डीजल पर असर

अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत इस साल की शुरुआत में 2.73 डॉलर प्रति गैलन तक आ गई थी, जो अब बढ़कर 2.96 डॉलर हो चुकी है। अनुमान है कि यह जल्द 3 डॉलर के पार जा सकती है।

मौसमी मांग और पश्चिम एशिया के हालात—दोनों मिलकर कीमतों पर दबाव बना रहे हैं। अगर होर्मुज़ में व्यवधान कुछ दिनों से आगे खिंचता है, तो असर और स्पष्ट दिख सकता है।

लंबा बंद रहा तो क्या होगा

विश्लेषकों के अनुसार, कुछ दिनों की रुकावट और कई हफ्तों की बंदी में बड़ा फर्क है। यदि जलडमरूमध्य लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। ऐसा स्तर पिछली बार 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के शुरुआती महीनों में देखा गया था।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि सैन्य कार्रवाई अभी और आगे बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि अभियान लगभग चार सप्ताह तक चल सकता है। इससे अनिश्चितता और बढ़ी है।

यूरोप में गैस की छलांग

अमेरिका, जो दुनिया का सबसे बड़ा गैस उत्पादक है, वहां प्राकृतिक गैस की कीमतों पर असर सीमित रहा है। लेकिन यूरोप और एशिया की स्थिति अलग है। ये क्षेत्र कतर और अन्य पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्ताओं पर अधिक निर्भर हैं।

2 मार्च को यूरोप में गैस की कीमतों में लगभग 50% की तेज बढ़त दर्ज की गई। यह ऊर्जा बाजार में अब तक की सबसे बड़ी हलचल मानी जा रही है।

आगे की चिंता

जोखिम सिर्फ सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। किसी भी पक्ष की एक चूक—चाहे वह टैंकर पर हमला हो या ऊर्जा परिसंपत्तियों को नुकसान—स्थिति को तेजी से बिगाड़ सकती है। क्षेत्र में सक्रिय समूहों की भूमिका भी समीकरण को जटिल बना रही है।

फिलहाल बाजार यह मानकर चल रहा है कि हालात नियंत्रित रहेंगे और तेल प्रवाह जल्द बहाल होगा। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ऊर्जा की कीमतें आम उपभोक्ता से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पर सीधा असर डाल सकती हैं।

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