जब सुबह पूरी नहीं लगती

जब सुबह पूरी नहीं लगती
✍️ Vivek Balodi

हम सचमुच ऐसे ही रहते हैं
जैसे आज बस ठहरने की जगह हो,
और जीवन कहीं आगे
पक्की दीवारों वाला इंतज़ार कर रहा हो।

सुबह की धूप खिड़की पर आती है
पर हम उसकी ओर पूरी तरह देखते नहीं,
सोचते हैं —
अभी तो शुरुआत है,
कभी एक ऐसी सुबह आएगी
जो थकान भी मिटा देगी
और उलझन भी।

इसी भरोसे में
हम चाय की भाप उड़ जाने देते हैं,
बातों के बीच की हँसी
अधूरी छोड़ देते हैं,
और थकी हुई शामों को
बस एक और दिन कहकर टाल देते हैं।

जो पास बैठा है
उसकी आवाज़ में हमें कमी सुनाई देती है,
जो दूर चला गया
उसकी चुप्पी में अर्थ खोजते रहते हैं।

दूसरों की आदतें
दूसरों की भूलें
दूसरों की कहानियाँ —
सब याद रहती हैं।

बस एक जगह है भीतर
जहाँ हल्की-सी खालीपन की दरार है,
उस पर नज़र ठहरती नहीं।

शायद बात बहुत सीधी है —
जिस सुकून को हम आने वाले समय की जेब में रखे समझते हैं,
वह चुपचाप यहीं बैठा होता है,
हमारे अपने भीतर,
बिना आवाज़ किए।

पर यह बात
अक्सर उम्र गुजर जाने के बाद समझ आती है।

 

–  Vivek Balodi

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