जो कहना रह गया

कभी मैं सोचता हूँ
जिसके रोने की आवाज़
तुम तक कभी पहुँची ही नहीं,
क्या उसकी ख़ामोशी
तुम्हें आज भी कहीं छूती है।
वो जो हर बात में
प्यार जता जाता था,
शायद इसलिए
क्योंकि उसके पास
कहने के लिए और कुछ था ही नहीं।
कभी अगर वो मिल जाता
तो ज़िंदगी कैसी होती—
ये सवाल नहीं है,
ये बस एक ठहरी हुई साँस है
जो आज भी
बीच रास्ते अटकी हुई है।
जिसने तुम्हें इश्क़ सिखाया,
वो खुद इश्क़ में
कितना अनपढ़ रह गया,
ये बात शायद
तुमने कभी नहीं सोची।
मैं उसका दर्द जी नहीं पाया,
बस दूर खड़ा होकर
उसे समझने की कोशिश करता रहा।
जो बात सीधी कह नहीं सका,
वो काग़ज़ पर
धीरे-धीरे उतरती रही।
ये कविताएँ
उस तक नहीं पहुँचेंगी,
मुझे पता है।
पर शायद
इन्हीं में कहीं
वो सब कह दिया है
जो समय पर
कह नहीं पाया।
– Vivek Balodi
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“khamoshiyaan kar de bayaan, to alag baat hain,
Warna, kuch shabd hain jo lafzon pe utaare nhi jaate.”