लफ़्ज़

लफ़्ज़ मुसाफिर हैं
कब अमर रह पाए हैं
बस जिन्हें लगता है
‘हमेशा’ कुछ होता है
वो इस यकीन में हैं
कि,
सब बचपना था
जो
अब रहा नहीं
वो
कुछ बातें थीं
सपनों की
वो वक्त
आज बड़ा हो गया
कहीं
ख्वाहिशों की साजिशें रही होंगी
जो मासूम थीं
खैर,
अब सब नियामित नजर आते हैं
सब ठीक हैं.
वाकयी?
हाँ. यही सच है.
सपने-सा सच
गुजर चुके
उस बचपन-का सच
शब्दों-का सच
हर एहसास-का मौन
सच |
इतने सारे सच
पर,
इस सच की महफ़िल में
कौन सा, अपना सच ?
..,
कहा था एहसास ने, लफ्ज मुसाफिर हैं
यहाँ तक पहुँच गए, बिन इज़ाज़त
पर ये कहा अमर हैं
टिक नहीं पाएंगे, ज्यादा वक्त तक
हमेशा जैसा कुछ होता कहाँ है ||
लफ़्ज़ मुसाफिर हैं 🍁
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