सब्र

बहुत सब्र किया, इस सोचते हुए आसमान ने।
फिर किसी धैर्य ने अचानक आकर, उस आसमान को धरा पर ला पटक़ा।
अब मतलब नहीं रहा, कि समय की क्या मर्ज़ी है।
जो भी यक़ीन के क़ाबिल लगा, आदत बनता चला गया।
ये एहसास की दुनिया है ही ऐसी।
न क़बूलते बनता है, न ये कहते,
कि सब एक सपना सा था।
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