साथ ही रहते हैं

कुछ यादें होती हैं
जो पीछा नहीं करतीं,
बस साथ चलती हैं।
जैसे कमरे में पड़ी कोई पुरानी चीज़—
दिखती नहीं,
पर उसकी मौजूदगी से
हवा थोड़ी बदली हुई लगती है।
मैं हँसता हूँ
तो भीतर कहीं कुछ देर के लिए
वही पुरानी हलचल लौट आती है।
उदासी आती है
तो वो भी अकेली नहीं आती—
उसके साथ तुम्हारी खामोशी चली आती है।
दिन भर की थकान में
कभी आँखें भारी हो जाती हैं,
कभी साँसें धीमी।
इन सबके बीच
कोई कहानी चलती रहती है
बिना आवाज़ के।
मैं दूर हूँ,
पर दूरी ने
कुछ छीन लिया हो—
ऐसा नहीं लगता।
कुछ चीज़ें
अब भी वैसे ही हैं,
बस जैसे किसी ने
उन्हें छूने से मना कर दिया हो।
शायद यही वजह है
कि अकेलापन
पूरी तरह खाली नहीं लगता।
कुछ शरारतें,
कुछ आवाज़ें,
कुछ साँसें—
अब भी साथ ही रहती हैं।
– Vivek Balodi
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