तुम्हारे पास

मैं खुद को तुम्हारे पास छोड़ देना चाहता हूँ,
बस इस तरह कि
वक़्त थोड़ी देर
अपने सवाल भूल जाए,
और मैं
तुम्हारे पास बैठा रहूँ
जैसे साँस बैठती है फेफड़ों में—
बिना बताए।
मुझसे पूरा होने की उम्मीद मत रखना,
अधूरा कहलाने का डर भी मत रखना ।
मैं गिनती से बाहर
एक हल्की-सी मौजूदगी हूँ
जो नाम से पहले
चुपचाप खड़ी रहती है।
तुम्हारे साथ जी हुई ज़िंदगी
हथेली में समाई हुई लगती है,
छोटी नहीं,
बस पूरी।
और फिर भी
वक़्त का सारा फैलाव
कम पड़ जाता है।
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो समझ आता है
कि समय ने हमेशा
अपनी सीमा रखी है,
हमारी चाह से कम।
शायद,
किसी मोड़ पर रुक जाना
ज़रूरी था।
भागते रहने से ज़्यादा
वहाँ ठहरना ज़रूरी था—
ताकि दोबारा
कोई नाम न लेना पड़े,
कोई पहचान न माँगनी पड़े,
और हम
सिर्फ़ एक-दूसरे के पास
मौजूद रह सकें।
– Vivek Balodi
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