म्यांमार में तख्तापलट के बाद पहला चुनाव, लेकिन सवालों के घेरे में

2021 के सैन्य कब्जे के बाद पहली बार वोटिंग, हालात सामान्य नहीं

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म्यांमार में 2021 के बाद पहला चुनाव, लेकिन हालात असामान्य

करीब चार साल पहले लोकतांत्रिक सरकार हटाए जाने के बाद म्यांमार में पहली बार आम चुनाव कराए जा रहे हैं। लेकिन यह चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब देश हिंसा, गृहयुद्ध और सख्त पाबंदियों से जूझ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और स्थानीय लोग, दोनों ही इस प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

मुख्य तथ्य

  • म्यांमार में 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद पहला आम चुनाव शुरू
  • 330 में से 65 टाउनशिप में मतदान रद्द
  • मतदान के दो और चरण 11 और 25 जनवरी को होंगे
  • चुनाव हिंसा और गृहयुद्ध के माहौल में हो रहे हैं
  • संयुक्त राष्ट्र ने चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं माना

क्या हो रहा है म्यांमार में

म्यांमार की सैन्य सरकार ने 2021 के तख्तापलट के बाद पहली बार आम चुनाव की प्रक्रिया शुरू की है। यह वही तख्तापलट था, जिसमें लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार और नेता Aung San Suu Kyi को सत्ता से हटा दिया गया था। मौजूदा चुनाव पूरे देश में एक साथ नहीं हो रहे हैं, क्योंकि सुरक्षा कारणों से 65 टाउनशिप में मतदान रद्द कर दिया गया है।

चुनाव तीन चरणों में कराए जा रहे हैं। पहला चरण शुरू हो चुका है, जबकि बाकी दो चरण जनवरी में होंगे। हालांकि, चुनाव की प्रक्रिया पर शुरू से ही सवाल खड़े हो गए हैं, क्योंकि देश के बड़े हिस्से में सामान्य हालात नहीं हैं।

पृष्ठभूमि: हिंसा और विस्थापन

2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद म्यांमार एक लंबे गृहयुद्ध में फंस गया। इस संघर्ष में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और करीब 35 लाख लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए। चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब देश के कई हिस्सों में हिंसा जारी है और आम लोगों की आवाज दबाई जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र ने साफ कहा है कि मौजूदा हालात स्वतंत्र अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों के अनुकूल नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख Volker Türk ने कहा कि चुनाव हिंसा और दमन के माहौल में कराए जा रहे हैं।

राजनीतिक तस्वीर और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

म्यांमार की सेना के प्रमुख Min Aung Hlaing ने इन चुनावों को देश के 5.5 करोड़ लोगों के बीच सुलह की दिशा में कदम बताया है। लेकिन पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने इसे न तो स्वतंत्र और न ही विश्वसनीय माना है।

लोकतंत्र समर्थक दलों को चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को भंग कर दिया गया है और वह चुनाव में हिस्सा नहीं ले रही। ऐसे में सेना समर्थित यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) की जीत तय मानी जा रही है।

जमीनी हालात और आगे की राह

राजधानी यांगून समेत कई शहरों में मतदान केंद्रों के आसपास भारी सुरक्षा तैनात की गई है। पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें न तो नोटा का विकल्प है और न ही किसी उम्मीदवार का नाम लिखने की अनुमति।

कुछ स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय आलोचना उनके लिए मायने नहीं रखती, जबकि कई लोग मानते हैं कि सैन्य शासन में निष्पक्ष चुनाव संभव ही नहीं है। विश्लेषकों का कहना है कि चुनाव के बाद भी सेना की पकड़ कमजोर नहीं होगी और नया प्रशासन अप्रैल 2026 में कार्यभार संभालेगा, लेकिन इससे देश की राजनीतिक संकट खत्म होने की उम्मीद कम है।

Q&A Section

Q1: म्यांमार में चुनाव क्यों विवादों में हैं?

क्योंकि ये चुनाव हिंसा, गृहयुद्ध और राजनीतिक पाबंदियों के माहौल में हो रहे हैं, जहां स्वतंत्र अभिव्यक्ति संभव नहीं है।

Q2: चुनाव के बाद म्यांमार में क्या बदलेगा?

विश्लेषकों के अनुसार, सेना का नियंत्रण बना रहेगा और राजनीतिक संकट का समाधान फिलहाल दूर दिखाई देता है।

 

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