नोबेल शांति पुरस्कार और अमेरिकी राष्ट्रपति: ओबामा से ट्रंप तक क्यों बदला रुख

ओबामा को कार्यकाल के शुरुआती दौर में मिला सम्मान, ट्रंप के मामले में नोबेल समिति की सख्ती और पुरस्कार की बदलती राजनीति

Virat
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नोबेल शांति पुरस्कार: ओबामा से ट्रंप तक बदली राजनीति

नोबेल शांति पुरस्कार हमेशा सिर्फ सम्मान भर नहीं रहा। वक्त के साथ यह वैश्विक राजनीति, नेतृत्व की छवि और सत्ता की संवेदनाओं से भी गहराई से जुड़ता गया है। अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों—बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप—का उदाहरण इस बदलाव को साफ दिखाता है।

जहां 2009 में बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनने के महज एक साल के भीतर नोबेल शांति पुरस्कार दे दिया गया था, वहीं आज यही नोबेल समिति ट्रंप को इस सम्मान से दूर रखने को लेकर असहज और सतर्क दिखती है।

ओबामा को “जल्दी” मिला नोबेल

जब ओबामा ने 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकार किया, तो उन्होंने खुद कहा था कि वह इसके योग्य नहीं हैं। नोबेल समिति ने उनके “अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को मजबूत करने के असाधारण प्रयासों” का हवाला दिया था।

लेकिन इसके बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ाने और ड्रोन हमलों की नीति ने उस फैसले पर सवाल खड़े कर दिए। यहां तक कि नोबेल समिति के पूर्व सचिव गीर लुंडेस्टैड ने अपनी किताब में माना कि यह फैसला उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया और कई ओबामा समर्थकों को भी यह पुरस्कार गलत लगा।

ट्रंप और नोबेल की चाह

डोनाल्ड ट्रंप के बारे में लंबे समय से कहा जाता रहा है कि वह नोबेल शांति पुरस्कार पाने के इच्छुक हैं। हालिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि भारत पर भारी टैरिफ लगाने जैसे फैसलों के पीछे भी नोबेल को लेकर उनकी नाराज़गी जुड़ी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत-पाकिस्तान युद्ध रोकने के ट्रंप के दावे से असहमति जताने के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया।

वेनेजुएला के मामले में भी यही तस्वीर दिखती है। विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो, जिन्हें 2025 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला, उन्होंने व्हाइट हाउस में मुलाकात के दौरान प्रतीकात्मक रूप से यह पुरस्कार ट्रंप को सौंप दिया। हालांकि नोबेल समिति ने तुरंत साफ किया कि पुरस्कार किसी और को दिया या ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।

नियम सख्त, लेकिन असल दुनिया अलग

नोबेल समिति पुरस्कार के नाम और सम्मान को लेकर बेहद सख्त है। न तो उसे किसी और को सौंपा जा सकता है, न दोबारा दिया जा सकता है। बीते दशकों में समय से पहले या राजनीतिक रूप से विवादित फैसलों की आलोचना के बाद समिति अब ज्यादा सतर्क हो गई है।

लेकिन पुरस्कार का भौतिक रूप—यानी नोबेल मेडल—पूरी तरह विजेता की संपत्ति होता है। और यही बात इसे एक अलग ही दिशा में ले जाती है।

करोड़ों में बिकते नोबेल मेडल

हाल के वर्षों में नोबेल मेडल्स नीलामी बाजार में रिकॉर्ड तोड़ कीमतों पर बिके हैं। 2022 में रूसी पत्रकार दिमित्री मुरातोव ने अपना नोबेल मेडल यूक्रेनी बच्चों की मदद के लिए नीलाम किया, जो 103.5 मिलियन डॉलर में बिका।

वहीं अमेरिकी भौतिक विज्ञानी लियोन लेडरमैन को अपने इलाज का खर्च उठाने के लिए मेडल बेचना पड़ा। इस पर अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर तीखी टिप्पणियां भी हुईं।

नोबेल समिति इन नीलामियों को न रोक सकती है, न नियंत्रित कर सकती है।

सम्मान स्थायी, इस्तेमाल व्यक्तिगत

ओबामा ने विवाद को कम करने के लिए अपने नोबेल पुरस्कार की पूरी रकम दान कर दी थी। यह एक नैतिक कदम था, लेकिन नियमों के तहत पुरस्कार का स्वामित्व उन्हीं के पास रहा।

कुल मिलाकर, नोबेल शांति पुरस्कार आज भी प्रतीकात्मक रूप से बेहद शक्तिशाली है, लेकिन उसका इस्तेमाल, उसकी राजनीति और उससे जुड़ी अपेक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा जटिल हो चुकी हैं। ओबामा और ट्रंप का फर्क यही दिखाता है कि नोबेल समिति भले ही इतिहास को नियंत्रित करना चाहे, लेकिन वह न तो राजनीति को रोक सकती है और न ही पुरस्कार के बाद की कहानी लिख सकती है।

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