अब 75 की उम्र में पीएम मोदी की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

टी-सैलर के बेटे से प्रधानमंत्री बनने तक मोदी की यात्रा ने भारतीय राजनीति को बदला। अब चुनौती है विविधता और असहमति को सुरक्षित रखने की।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष के हो गए हैं। यह अवसर केवल उनके व्यक्तिगत सफर का जश्न नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की ताकत और उसकी चुनौतियों पर भी विचार करने का है। चाय बेचने वाले के बेटे से देश के शीर्ष पद तक का उनका सफर लोकतंत्र की गहराई और उसकी क्षमता का प्रतीक है।

मुख्य तथ्य

  • पीएम मोदी ने हाशिए पर खड़ी जातियों और समुदायों को सत्ता के केंद्र में लाया।
  • सोशल मीडिया और जनभावनाओं को समझने में उनकी गहरी पकड़ रही है।
  • नोटबंदी और GST जैसे बड़े कदमों ने उनकी “भव्य” शैली को दिखाया, लेकिन विस्तार की कमी भी रही।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि अब उनकी प्राथमिकता विविधता और असहमति को सुरक्षित करना होनी चाहिए।
  • “अमृतकाल” में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की चुनौती भी उनके सामने है।

75 साल की उम्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है। एक चाय बेचने वाले के बेटे से देश के प्रधानमंत्री बनने तक की उनकी यात्रा ने न केवल बीजेपी बल्कि पूरी राजनीति के चरित्र को बदल डाला। उनके सत्ता में आने से ओबीसी राजनीति मुख्यधारा में आई और बीजेपी पर “बनिया-ब्राह्मण पार्टी” का ठप्पा भी टूटा।

मोदी की सबसे बड़ी ताकत रही है जनता की नब्ज़ पहचानना और संवाद की कला। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही उन्होंने सोशल मीडिया और आधुनिक पीआर तकनीकों का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। यही कारण है कि आज वे लगातार तीसरी बार देश का नेतृत्व कर रहे हैं। विरोधियों से मेल-मिलाप और बड़े फैसले लेने की क्षमता ने उन्हें अलग पहचान दी। हालांकि नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े कदमों को लेकर नीति-निर्धारण में विस्तार की कमी की आलोचना भी हुई।

अब जब वे 75 के हो रहे हैं, देश उनसे नई दिशा की उम्मीद कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि “विरासत” बनाने के लिए मोदी को अब विविधता और असहमति को सुरक्षित रखना होगा। हाल ही में नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश के अनुभव दिखाते हैं कि जब समाज में असंतोष बढ़ता है, तो सत्ता अस्थिर हो जाती है। भारत की स्थिरता का आधार उसकी बहुलता और संस्थानों की मजबूती है।

बीजेपी और आरएसएस के भीतर भी यह समझ बन रही है कि ध्रुवीकरण की राजनीति अब उतना लाभ नहीं देगी। “हिंदूकरण” की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, अब ज़रूरत है सुशासन और संस्थानों को मजबूत करने की। मीडिया, न्यायपालिका और संसद जैसी संस्थाओं को बिना दबाव काम करने देना ही देश को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है।

आखिरकार, असहमति केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि नए विचारों और नवाचार का स्रोत भी है। जब भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रिसर्च-डेवलपमेंट की दौड़ में कदम मिला रहा है, तब “आत्मनिर्भर भारत” का असली स्वरूप तभी सामने आएगा जब देश विविधता और विचारों की आज़ादी को गले लगाएगा।

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