Vivek balodi

Vivek Balodi

📅 1997 📍 Delhi

विवेक बलोदी
मैं,
उन दो ज़िंदगियों के बीच खड़ा,
एक जो दुनिया के लिए साँस लेती है,
और दूसरी जो खुद के लिए तड़पती है।
मैं अपनी कविताएँ
उसी दूसरी ज़िंदगी के नाम लिखता हूँ,
जिसे जीने की हिम्मत रोज़ जुटाता हूँ।
मैं जहाँ मौजूद होता हूँ,
अक्सर वहाँ मेरा वजूद नहीं होता।

मैं यादों में रहता हूँ,
ख़्वाबों में साँस लेता हूँ,
और कोरे कागज़ों पर खुद को बस थोड़ा-सा बचा लेता हूँ।

कविताएँ

विवेक बलोदी
मैं,
उन दो ज़िंदगियों के बीच खड़ा,
एक जो दुनिया के लिए साँस लेती है,
और दूसरी जो खुद के लिए तड़पती है।
मैं अपनी कविताएँ
उसी दूसरी ज़िंदगी के नाम लिखता हूँ,
जिसे जीने की हिम्मत रोज़ जुटाता हूँ।
मैं जहाँ मौजूद होता हूँ,
अक्सर वहाँ मेरा वजूद नहीं होता।

मैं यादों में रहता हूँ,
ख़्वाबों में साँस लेता हूँ,
और कोरे कागज़ों पर खुद को बस थोड़ा-सा बचा लेता हूँ।