नई दिल्ली की हवा में आज राहत भी है और सतर्कता भी। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगाए गए ऊंचे टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया है। यह फैसला भारतीय शेयर बाजारों के लिए बड़ी खबर है और लंबे समय से अटकी ट्रेड डील के आगे बढ़ने का संकेत भी।
लेकिन इस राहत के साथ कई सवाल भी खड़े हो गए हैं, खासकर खेती और उससे जुड़े करोड़ों लोगों को लेकर।
इस ट्रेड समझौते के आधिकारिक दस्तावेज अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। ऐसे में जो सामने आया है, वह पूरा समझौता नहीं बल्कि एक राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत माना जा रहा है।
टैरिफ कट से किन सेक्टरों को फायदा?
18 फीसदी का नया टैरिफ रेट भारत के टेक्सटाइल और ज्वेलरी सेक्टर के लिए राहत लेकर आया है। इन क्षेत्रों में अमेरिका एक बड़ा बाजार रहा है और ऊंचे टैरिफ की वजह से निर्यात पर असर पड़ा था।
आंकड़े बताते हैं कि अगस्त से अक्टूबर के बीच अमेरिका को भारत का निर्यात 6.86 अरब डॉलर से गिरकर 6.30 अरब डॉलर रह गया था। इसी दौरान अमेरिका से भारत का आयात बढ़कर 4.84 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
टैरिफ घटने से यह असंतुलन कुछ हद तक सुधर सकता है।
खेती क्यों बन रही है चिंता का केंद्र?
इस डील पर सबसे बड़ा सवाल कृषि सेक्टर को लेकर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के मुताबिक, 18 फीसदी टैरिफ के बदले भारत ने अमेरिकी सामानों पर अपने टैरिफ और नॉन-टैरिफ बैरियर्स को “जीरो की ओर ले जाने” पर सहमति जताई है।
किन सेक्टरों पर यह लागू होगा, यह साफ नहीं किया गया है।
भारत में कई कृषि उत्पादों पर टैरिफ काफी ऊंचे हैं—जैसे शराब पर 150 फीसदी और कई फल-सब्जियों पर 100 फीसदी तक। अगर इन्हें तेजी से घटाया गया, तो अमेरिकी सब्सिडी वाले सस्ते उत्पाद भारतीय बाजार में आ सकते हैं।
मक्का, सोयाबीन ऑयल और डेयरी प्रोडक्ट्स जैसी चीजों में छोटे भारतीय किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो सकती है।
‘जश्न से पहले सावधानी जरूरी’
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के फाउंडर अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत अब तक फूड ग्रेन, जेनेटिकली मॉडिफाइड उत्पादों और संवेदनशील आयात को खोलने से बचता रहा है।
उनके मुताबिक, जब तक संयुक्त बयान, तय शर्तें और लागू करने का तरीका साफ नहीं होता, तब तक इसे पूरा ट्रेड डील मानना जल्दबाजी होगी। उनका साफ संदेश है—जश्न नहीं, सावधानी।
अमेरिका का नजरिया साफ
अमेरिका की कृषि मंत्री ने सोशल मीडिया पर इस समझौते को अमेरिकी किसानों के लिए बड़ी जीत बताया। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका इसे भारत के साथ अपने 1.3 अरब डॉलर के कृषि व्यापार घाटे को कम करने के मौके के तौर पर देख रहा है।
बादाम, अखरोट और सेब जैसे अमेरिकी उत्पादों का आयात बढ़ने से हिमाचल प्रदेश और कश्मीर जैसे इलाकों के किसानों पर सीधा असर पड़ सकता है। डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर को लेकर भी लंबे समय से अमेरिका की दिलचस्पी रही है।
राजनीतिक सवाल भी उठे
इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। योगेंद्र यादव ने सरकार से संसद में साफ जवाब देने की मांग की है कि क्या भारतीय बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोले जा रहे हैं। उनका कहना है कि किसान जवाब चाहते हैं।
डिटेल्स अब भी धुंधली
CSIS के सीनियर एडवाइजर रिचर्ड रॉसव का कहना है कि अमेरिका को भारत में बेहतर मार्केट एक्सेस मिला है और कई नॉन-टैरिफ बैरियर्स हटाए गए हैं।
हालांकि, गेहूं और चावल जैसे स्टेपल ग्रेन भारत के लिए “रेड लाइन” बने रहेंगे, क्योंकि ये फूड सिक्योरिटी और MSP सिस्टम से जुड़े हैं। सवाल यह है कि ‘जीरो टैरिफ’ की बात लंबी अवधि का इरादा है या सीमित दायरे की प्रतिबद्धता।
भारत को रणनीतिक बढ़त
टैरिफ घटने के बाद भारत को क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों पर बढ़त मिली है। भारत का 18 फीसदी टैरिफ अब इंडोनेशिया, बांग्लादेश और वियतनाम से कम है।
मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर भारत की स्थिति मजबूत हो सकती है, क्योंकि वियतनाम और साउथईस्ट एशिया के कई देशों पर अभी ज्यादा टैरिफ है।
बाजारों की प्रतिक्रिया
इस घोषणा के बाद शेयर बाजार और रुपये में हलचल दिखी। निफ्टी 50 में तेज उछाल आया और दिन के अंत में 2.8 फीसदी की बढ़त दर्ज हुई।
रुपया डॉलर के मुकाबले 1.2 फीसदी मजबूत हुआ, जो तीन साल में एक दिन की सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है। विदेशी निवेशकों की वापसी को लेकर उम्मीदें जगी हैं, हालांकि हाल के महीनों में भारी बिकवाली हो चुकी है।
निष्कर्ष
यह ट्रेड डील भारत के लिए मौके भी लेकर आई है और चुनौतियां भी। उद्योग और बाजार को राहत मिली है, लेकिन खेती जैसे संवेदनशील सेक्टर पर इसका असर क्या होगा, यह अभी साफ नहीं है।
असली तस्वीर तब सामने आएगी, जब समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक होंगी।


