अमेरिका में 2026 के मिडटर्म चुनाव अब एक साल से भी कम दूर हैं। ऐसे में यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन कांग्रेस में अपनी बढ़त बनाए रख पाएगी। चुनाव का नतीजा पहले से कोई नहीं जानता, लेकिन इतिहास के आंकड़े इस बहस को एक दिशा जरूर देते हैं।
आधुनिक अमेरिकी राजनीति में मिडटर्म चुनावों का एक मजबूत पैटर्न रहा है। 1946 से अब तक हुए 20 मिडटर्म चुनावों में से 18 बार व्हाइट हाउस में बैठी पार्टी ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में सीटें गंवाई हैं। यानी करीब 90% मामलों में राष्ट्रपति की पार्टी को नुकसान हुआ है। इस लिहाज से देखें तो 2026 में रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती बड़ी है, खासकर तब जब हाउस में उसका बहुमत पहले ही बहुत पतला है।
इतिहास सिर्फ संख्या नहीं, हालात भी बताता है। जिन राष्ट्रपतियों की लोकप्रियता मिडटर्म से ठीक पहले 50% से नीचे रही, वे सभी हाउस में सीटें हार गए। इसमें हैरी ट्रूमैन से लेकर जो बाइडन तक कई नाम शामिल हैं। डोनाल्ड ट्रंप खुद 2018 के मिडटर्म में इसी स्थिति से गुजरे थे, जब उनकी अप्रूवल रेटिंग 38% थी और रिपब्लिकन पार्टी को 40 सीटों का नुकसान हुआ था।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि लोकप्रिय राष्ट्रपति भी मिडटर्म में नुकसान से नहीं बच पाए। ड्वाइट आइजनहावर, जॉन एफ. केनेडी, रोनाल्ड रीगन और जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश जैसे नेताओं ने भी अपने कार्यकाल में मिडटर्म झेले। बीते 80 वर्षों में सिर्फ दो अपवाद दिखते हैं—1998 और 2002।
1998 में बिल क्लिंटन के दौर में अर्थव्यवस्था मजबूत थी और महाभियोग की प्रक्रिया के बावजूद जनता का बड़ा हिस्सा रिपब्लिकन कदमों से सहमत नहीं था। नतीजा यह हुआ कि डेमोक्रेट्स ने पांच सीटें जीतीं। 2002 में 9/11 हमलों के बाद जॉर्ज डब्ल्यू. बुश की लोकप्रियता काफी ऊंची थी और “रैली अराउंड द फ्लैग” माहौल में रिपब्लिकन पार्टी को आठ सीटों का फायदा हुआ। दोनों ही मामलों में जीत सीमित थी, कोई बड़ी लहर नहीं।
मिडटर्म चुनाव इसलिए भी अहम होते हैं क्योंकि मामूली बदलाव भी सत्ता संतुलन बदल देते हैं। 1946 के बाद हर मिडटर्म में कम से कम पांच सीटें एक पार्टी से दूसरी पार्टी में गई हैं। अगर 2026 में सिर्फ पांच सीटें भी रिपब्लिकन से डेमोक्रेट्स की ओर चली गईं, तो हाउस का नियंत्रण बदल सकता है।
हालांकि, 2026 को पूरी तरह पुराने पैटर्न से जोड़कर देखना भी आसान नहीं है। अगले एक साल में कई चीजें बदल सकती हैं—जैसे कुछ राज्यों में री-डिस्ट्रिक्टिंग, राष्ट्रपति की लोकप्रियता में सुधार या कोई बड़ा अप्रत्याशित घटनाक्रम। अगर ट्रंप की जॉब अप्रूवल 50% से ऊपर जाती है, तो रिपब्लिकन नुकसान को सीमित कर सकते हैं और संभव है कि बहुमत बचा लें।
इसके अलावा, हाल के चुनावों में जिस तरह नतीजों को लेकर कानूनी विवाद, पुनर्गणना और चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठे हैं, वे भी 2026 को जटिल बना सकते हैं। करीबी मुकाबलों में यह सब तस्वीर को और उलझा सकता है।
इतिहास एक साफ संकेत देता है—मिडटर्म चुनाव आमतौर पर सत्ता में बैठी पार्टी के लिए आसान नहीं होते। लेकिन राजनीति में कुछ भी पूरी तरह तय नहीं होता। 2026 के मिडटर्म शायद पिछले चुनावों जैसे न हों, और यही अनिश्चितता लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती भी है और उसकी ताकत भी।


