क्या वेनेजुएला बन सकता है दूसरा इराक या अफगानिस्तान?

मादुरो की गिरफ्तारी के बाद ‘वेनेजुएला चलाने’ के ऐलान ने उठाए बड़े सवाल, इतिहास क्यों चेतावनी देता है

Virat
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क्या वेनेजुएला बन सकता है दूसरा इराक या अफगानिस्तान?

जनवरी के पहले हफ्ते में सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। तस्वीर में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो आंखों पर पट्टी और हथकड़ी लगाए अमेरिकी नौसेना के जहाज पर दिख रहे थे। इसके कुछ ही समय बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका अब वेनेजुएला को तब तक “चलाएगा”, जब तक वहां “सुरक्षित, उचित और विवेकपूर्ण राजनीतिक बदलाव” नहीं हो जाता।

यह बयान केवल एक देश की सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह उस अमेरिकी विदेश नीति की झलक है, जो बीते वर्षों में दबाव, धमकी और ताकत के इस्तेमाल पर ज्यादा निर्भर होती गई है। सवाल यह नहीं कि मादुरो का शासन कैसा था। असली सवाल यह है कि क्या किसी देश को बल के जरिए चलाना स्थिरता और शांति ला सकता है।

मादुरो हटे, लेकिन क्या व्यवस्था बनेगी?

इस बात पर शायद ही कोई विवाद है कि निकोलस मादुरो के शासन में वेनेजुएला बुरी तरह टूटा। अर्थव्यवस्था ढह गई, लोकतांत्रिक संस्थाएं खोखली हो गईं, अपराध और सत्ता आपस में घुल गए और लाखों लोग देश छोड़कर बाहर चले गए, जिनमें बड़ी संख्या अमेरिका पहुंची।

लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि किसी शासक को हटाना और एक वैध राजनीतिक व्यवस्था खड़ी करना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। क्रूर या अयोग्य नेता को हटाने से अपने आप ऐसी व्यवस्था नहीं बन जाती, जिसे जनता स्वीकार करे।

ताकत और वैधता एक नहीं होती

वेनेजुएला को “चलाने” की अमेरिकी घोषणा अपने आप में एक जाल बनाती है। यह मान लिया गया है कि बाहरी ताकत, घरेलू वैधता की जगह ले सकती है। जबकि शोध और अनुभव बताते हैं कि ताकत सत्ता गिरा सकती है, लेकिन राजनीतिक अधिकार पैदा नहीं कर सकती।

जब कूटनीति, आर्थिक सहयोग और विश्वास-निर्माण की जगह सैन्य दबाव को मुख्य हथियार बना दिया जाता है, तो अस्थिरता कम होने के बजाय और गहरी हो जाती है। स्थानीय राजनीतिक संकट, राष्ट्रीय सम्मान और पहचान की लड़ाई में बदल जाता है।

ज्यादा सैन्य ताकत, कम कूटनीति

वेनेजुएला का मामला कोई अलग-थलग घटना नहीं है। शीत युद्ध खत्म होने के बाद भी अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप कम नहीं किए। फर्क बस इतना आया कि कई हस्तक्षेप अब सिर्फ अस्थायी कार्रवाई नहीं रहे, बल्कि लंबे समय तक शासन और सुरक्षा संभालने के मिशन बन गए।

इराक (2003) और अफगानिस्तान (2001) इसके बड़े उदाहरण हैं। जहां शुरुआत सीमित उद्देश्यों से हुई, लेकिन धीरे-धीरे अमेरिका बिजली, पानी, रोजगार, सुरक्षा और राजनीतिक सुलह तक की जिम्मेदारी उठाने लगा। नतीजा यह हुआ कि विदेशी ताकत स्थिरता लाने के बजाय विरोध और असंतोष का केंद्र बन गई।

अफगानिस्तान, इराक और लीबिया से क्या सीखा?

अफगानिस्तान में 20 साल की कोशिशें अमेरिकी सेना के हटते ही ढह गईं। वजह साफ थी—राजनीतिक व्यवस्था जनता की सहमति पर नहीं, बाहरी ताकत पर टिकी थी।

इराक में अमेरिकी आक्रमण के बाद रक्षा विभाग की योजना को तरजीह दी गई, जिसने स्थानीय सामाजिक और ऐतिहासिक जटिलताओं को नजरअंदाज किया। अमेरिका वहां सिर्फ सुरक्षा ही नहीं, शासन का चेहरा भी बन गया। और वही विरोध का प्रतीक बन गया।

लीबिया में स्थिति अलग थी। वहां गद्दाफी हटे, लेकिन उसके बाद शासन का ढांचा ही नहीं बना। नतीजा—गृहयुद्ध, बिखराव और आज तक चल रही अराजकता।

तीनों मामलों में एक समान बात दिखती है—यह भरोसा कि अमेरिकी प्रबंधन राजनीतिक वैधता की जगह ले सकता है।

वेनेजुएला में वही गलती?

वेनेजुएला की बुनियादी संरचना पहले से जर्जर है। अगर अमेरिका वहां शासन की जिम्मेदारी लेता है, तो हर बिजली कटौती, हर खाद्य संकट और हर प्रशासनिक नाकामी का दोष उसी पर आएगा। जो खुद को मुक्तिदाता बताएगा, वह बहुत जल्दी कब्जाधारी के रूप में देखा जाने लगेगा।

इसके अलावा, किसी संप्रभु देश पर हमला कर उसे चलाने का दावा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के उन सिद्धांतों को कमजोर करता है, जिनकी वकालत अमेरिका खुद करता है। यह सहयोगियों के लिए भी असहज स्थिति पैदा करता है और विरोधियों को मजबूत तर्क देता है।

वैश्विक असर सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित नहीं

वॉशिंगटन के कदमों को सिर्फ यूरोप ही नहीं देख रहा। एशिया में ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया भी इन संकेतों को समझ रहे हैं। वहीं बीजिंग और मॉस्को ऐसे उदाहरणों का इस्तेमाल अपने कदमों को正 ठहराने के लिए कर सकते हैं।

जब कोई ताकत यह संदेश देती है कि जहां संभव हो वहां शासन बल से तय होगा, तो वैधता की बात कमजोर पड़ जाती है। इससे सहयोग धीरे-धीरे कठिन होता जाता है।

आखिर सबक क्या है?

ताकत तेज होती है। वैधता समय लेती है। लेकिन टिकाऊ शांति और स्थिरता सिर्फ वैधता से ही आती है।

अगर वेनेजुएला में शासन बल के जरिए चलाया गया, तो यह अफगानिस्तान, इराक और लीबिया की गलतियों की पुनरावृत्ति होगी। सत्ता गिराई जा सकती है, लेकिन राजनीतिक अधिकार बाहर से नहीं दिया जा सकता। बाहरी शासन स्थिरता नहीं, विरोध को जन्म देता है।

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