क्यों उत्तर भारत के लिए अरावली पहाड़ियां इतनी ज़रूरी हैं ?

माइनिंग पर नई परिभाषा से उठे सवाल, पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

manshi
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Aravalli protest

उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत की जलवायु, हवा और पानी को समझना हो, तो अरावली पहाड़ियों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हाल के हफ्तों में अरावली को लेकर माइनिंग और संरक्षण से जुड़ा विवाद एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि इसकी परिभाषा और कानूनी सुरक्षा को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है।

13 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने अरावली की एक नई परिभाषा प्रस्तावित की, जिसे 20 नवंबर को Supreme Court of India ने स्वीकार कर लिया। इस नई परिभाषा के तहत, अरावली वही भूमि मानी जाएगी जो स्थानीय स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हो।
Forest Survey of India के एक आंतरिक आकलन के मुताबिक, इससे अरावली का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा माइनिंग और दूसरे विकास कार्यों के खिलाफ मिलने वाली सुरक्षा से बाहर हो सकता है।

क्यों जताई जा रही है चिंता

इस बदलाव को लेकर आलोचकों का कहना है कि यह पहले से कमजोर हो चुकी अरावली पहाड़ियों के लिए बड़ा झटका हो सकता है। अरावली सिर्फ पत्थरों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के मैदानों के लिए एक तरह की पर्यावरणीय ढाल की तरह काम करती है।

केंद्र सरकार ने हालांकि राज्यों को पत्र लिखकर यह निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन किया जाए और जब तक टिकाऊ माइनिंग को लेकर एक मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता, तब तक अरावली क्षेत्र में कोई नई माइनिंग लीज़ न दी जाए।

अरबों साल पुरानी पहाड़ी श्रृंखला

अरावली पहाड़ियां दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती हैं। इनकी उम्र एक अरब साल से भी ज्यादा बताई जाती है और इनका निर्माण प्रीकैम्ब्रियन युग में टेक्टोनिक प्लेट्स की टक्कर से हुआ था।
करीब 700 किलोमीटर लंबी यह श्रृंखला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 37 ज़िलों में फैली है, जिसमें से लगभग 560 किलोमीटर हिस्सा राजस्थान में आता है।

आज की अरावली, अपने शुरुआती स्वरूप की तुलना में काफी घिस चुकी है। इसका कारण प्राकृतिक क्षरण के साथ-साथ लंबे समय से चल रही मानवीय गतिविधियां भी हैं।

रेत और प्रदूषण के खिलाफ एक दीवार

इसके बावजूद, अरावली की अहमियत कम नहीं होती। जैसे पश्चिमी घाट को प्रायद्वीपीय भारत का “वॉटर टॉवर” और जलवायु नियंत्रक माना जाता है, वैसे ही अरावली उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानों के लिए एक पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है।

अरावली थार रेगिस्तान से उड़ने वाली रेत को उत्तर भारत की ओर बढ़ने से रोकती है। यही वजह है कि यह क्षेत्र हवा की गुणवत्ता बनाए रखने में भी मदद करता है। अगर रेगिस्तानी रेत का फैलाव बढ़ता है, तो दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाके, जो पहले ही स्थानीय प्रदूषण से जूझ रहे हैं, और ज्यादा दबाव में आ सकते हैं।

कुल मिलाकर, अरावली पर चल रही बहस सिर्फ माइनिंग या परिभाषा की नहीं है। यह उस प्राकृतिक संतुलन की भी है, जो उत्तर भारत के बड़े हिस्से को जलवायु, हवा और भूजल के स्तर पर सहारा देता है।

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