AI के दिग्गज यान लेकुन, बोले—सिर्फ बड़े मॉडल बनाने से नहीं आएगी असली बुद्धिमत्ता

यैन लेकुन का कहना है कि मौजूदा AI सिस्टम असल दुनिया को समझने और अपने फैसलों के नतीजे भांपने में सक्षम नहीं हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है

Virat
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yann lecun

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में जहां AGI यानी आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस को अगला बड़ा लक्ष्य माना जा रहा है, वहीं इस क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली नामों में से एक, प्रोफेसर यान लेकुन, इस सोच से सहमत नहीं हैं। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और मेटा के पूर्व चीफ AI साइंटिस्ट लेकुन का साफ कहना है कि AGI को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जा रहा है और मौजूदा रास्ते पर चलते हुए इंसान जैसी बुद्धिमत्ता हासिल नहीं की जा सकती।

हाल ही में दावोस में हुई चर्चा के दौरान लेकुन ने मौजूदा AI सिस्टम्स को लेकर एक सख्त लेकिन अहम बात रखी। उनके मुताबिक, आज के बड़े लैंग्वेज मॉडल—जैसे ChatGPT—असल दुनिया को समझने की क्षमता ही नहीं रखते। यही वजह है कि इन्हें सिर्फ और बड़ा या ज्यादा डेटा से ट्रेन करना किसी समाधान की ओर नहीं ले जाएगा।

लेकुन का कहना है कि इंडस्ट्री यह मानकर चल रही है कि स्केलिंग ही सब कुछ है, यानी मॉडल को बड़ा करते जाओ और वह ज्यादा स्मार्ट होता जाएगा। लेकिन उनके शब्दों में, “हम इंसान जैसी बुद्धिमत्ता या सुपरइंटेलिजेंस तक सिर्फ इसी रास्ते से नहीं पहुंच सकते। इसके लिए सोच का तरीका ही बदलना होगा।”

एजेंटिक AI’ पर गंभीर सवाल

लेकुन की सबसे बड़ी चिंता मौजूदा ट्रेंड ‘एजेंटिक AI’ को लेकर है। यानी ऐसे AI सिस्टम जो अपने आप फैसले लें और काम करें। उनका सवाल सीधा है—अगर कोई सिस्टम अपने कदमों के नतीजे का अंदाजा ही नहीं लगा सकता, तो वह सही प्लानिंग कैसे करेगा?

वे कहते हैं कि समझदारी भरा व्यवहार तभी संभव है जब सिस्टम यह अनुमान लगा सके कि उसके किसी एक्शन के बाद दुनिया में क्या होगा। मौजूदा लैंग्वेज मॉडल यह क्षमता नहीं रखते।

इस बात को समझाने के लिए उन्होंने इंसानों से तुलना की। उनके मुताबिक, एक 10 साल का बच्चा पहली बार कोई काम करे तो भी उसे बिना लंबी ट्रेनिंग के कर लेता है। एक 17 साल का किशोर कुछ ही घंटों में गाड़ी चलाना सीख सकता है। इसके उलट, सेल्फ-ड्राइविंग कारों को लाखों घंटों का डेटा देने के बाद भी पूरी तरह भरोसेमंद ऑटोनॉमस ड्राइविंग नहीं मिल पाई है। लेकुन मानते हैं कि यह इस बात का संकेत है कि मौजूदा AI आर्किटेक्चर में ही कमी है।

भाषा की दुनिया बनाम असली दुनिया

लेकुन के अनुसार, भाषा की दुनिया असल दुनिया से कहीं ज्यादा सरल है। टेक्स्ट में अगला शब्द क्या होगा, यह अनुमान लगाना उतना जटिल नहीं है जितना भौतिक दुनिया को समझना। असली दुनिया में डेटा लगातार बदलता रहता है, वह शोर से भरा होता है और बहुत हाई-डायमेंशनल होता है।

उनका कहना है कि जिन जनरेटिव आर्किटेक्चर पर आज के लैंग्वेज मॉडल बने हैं, वे इस तरह के रियल-वर्ल्ड डेटा के लिए उपयुक्त नहीं हैं। यही वजह है कि मौजूदा मॉडल इंसानी समझ के करीब नहीं पहुंच पा रहे।

असली खतरा क्या है?

किलर रोबोट या AI के इंसानों पर काबू पाने की कहानियों से लेकुन ज्यादा चिंतित नहीं हैं। उनकी असली चिंता कुछ और है—AI का कंट्रोल कुछ गिनी-चुनी कंपनियों तक सिमट जाना।

वे चेतावनी देते हैं कि अगर हमारी पूरी “इन्फॉर्मेशन डाइट” कुछ प्राइवेट AI सिस्टम्स के जरिए तय होने लगेगी, तो यह लोकतंत्र, सांस्कृतिक विविधता और भाषाई विविधता के लिए खतरनाक होगा। उनके मुताबिक, जैसे प्रेस में विविधता जरूरी है, वैसे ही AI असिस्टेंट्स में भी विविधता होनी चाहिए, और यह तभी संभव है जब ओपन-सोर्स मॉडल मजबूत हों।

बंद होती रिसर्च पर नाराजगी

लेकुन ने AI रिसर्च के बंद होते जा रहे माहौल पर भी निराशा जताई। उनका कहना है कि AI में तेज प्रगति इसलिए संभव हुई क्योंकि रिसर्च खुली थी—पेपर पब्लिश होते थे, कोड शेयर होता था।

लेकिन अब स्थिति बदल रही है। उनके मुताबिक, OpenAI और Anthropic जैसी कंपनियां शुरू से ही बंद रही हैं, और पहले खुली मानी जाने वाली लैब्स भी धीरे-धीरे सीमित हो रही हैं। उनका यह भी कहना है कि इस वक्त सबसे बेहतर ओपन-सोर्स मॉडल चीन से आ रहे हैं, जिन्हें रिसर्च कम्युनिटी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रही है। लेकुन मानते हैं कि यह पश्चिमी देशों के लिए चेतावनी की तरह है।

 

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