जीवन रक्षक कैंसर दवाओं पर टैक्स खत्म करना और तंबाकू उत्पादों पर कर बढ़ाना—ये दोनों कदम मिलकर भारत में कैंसर इलाज को ज्यादा सुलभ और किफायती बना सकते हैं। यह बात AIIMS, नई दिल्ली के डॉक्टरों ने एक हालिया विश्लेषण में कही है, जो Frontiers in Public Health जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
डॉक्टरों का कहना है कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज की ऊंची लागत एक बड़ी बाधा है। ऐसे में टैक्स में राहत और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले उत्पादों पर ज्यादा कर, दोनों मिलकर इलाज के बोझ को कम करने में मदद कर सकते हैं।
टैक्स में राहत से दवाओं की पहुंच
यह विश्लेषण हाल की GST सिफारिशों पर आधारित है, जिसमें 33 जीवन रक्षक दवाओं—जिनमें कैंसर की दवाएं भी शामिल हैं—पर टैक्स को 12% और 5% से घटाकर शून्य करने की बात कही गई है। इसके अलावा, हाल ही में बजट भाषण में केंद्रीय वित्त मंत्री ने 17 कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी घटाने की घोषणा भी की थी।
AIIMS के ऑन्कोलॉजिस्ट और लेख के सह-लेखक डॉ. अभिषेक शंकर के अनुसार, नई और आधुनिक कैंसर थैरेपीज़ ने कई मामलों में मरीजों की उम्र और जीवन गुणवत्ता दोनों में सुधार दिखाया है। ऐसे में जरूरी है कि ये दवाएं ज्यादा से ज्यादा मरीजों तक पहुंचें।
उनका कहना है कि एक बार में टैक्स कटौती से कीमतों में भले ही बहुत बड़ा अंतर न दिखे, लेकिन जब ये दवाएं दो से तीन साल तक लेनी पड़ती हैं, तब कुल बचत काफी हो जाती है।
तंबाकू टैक्स से बच सकता है इलाज का भारी खर्च
लेख में यह भी कहा गया है कि तंबाकू पर टैक्स बढ़ाने से उसकी खपत घट सकती है, जिससे कैंसर के मामलों में कमी आएगी। चार राज्यों में किए गए एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि सिगरेट की कीमत में 10% बढ़ोतरी से लाखों मौतें टाली जा सकती हैं और इलाज पर होने वाला खर्च भी बड़े पैमाने पर बचाया जा सकता है।
डॉक्टरों के मुताबिक, अगर तंबाकू टैक्स में और ज्यादा बढ़ोतरी की जाती है, तो अगले दस सालों में इलाज पर होने वाले हजारों करोड़ रुपये के खर्च से बचा जा सकता है। साथ ही, इससे मिलने वाला राजस्व कैंसर की रोकथाम, जांच और इलाज में लगाया जा सकता है।
देश में दवाओं के विकास पर जोर
डॉ. शंकर ने यह भी कहा कि कैंसर जैसी महंगी थैरेपीज़ की लागत कम करने का एक रास्ता यह है कि उनका विकास भारत में ही हो। उन्होंने अकादमिक संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच ज्यादा गहरे सहयोग की जरूरत बताई, ताकि दवाओं के पेटेंट देश के पास रहें।
उनके मुताबिक, फिलहाल ज्यादातर सहयोग क्लीनिकल ट्रायल तक सीमित है, जबकि असली जरूरत नई दवाओं के विकास की है। अगर बौद्धिक संपदा अधिकार भारत या किसी शैक्षणिक संस्थान के पास हों, तो कीमतों पर बेहतर नियंत्रण संभव है।
व्यापक स्वास्थ्य नीति की दिशा
AIIMS डॉक्टरों का मानना है कि ये टैक्स से जुड़े फैसले सिर्फ कैंसर ही नहीं, बल्कि अन्य गैर-संचारी बीमारियों के इलाज और रोकथाम में भी मददगार हो सकते हैं। उनका कहना है कि तंबाकू और शराब जैसे उत्पादों से मिलने वाला कर, जिनका संबंध कई तरह के कैंसर से है, सीधे स्वास्थ्य सेवाओं में लगाया जाना चाहिए।


